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नालियां बंद, बेतरतीब सुंदरीकरण और चोक नाले: क्या लखनऊ में जलभराव के लिए सिर्फ मानसून जिम्मेदार है?

जलभराव की वजह बारिश या व्यवस्था की खामियां? लखनऊ में हर बारिश के बाद क्यों तैरने लगती हैं सड़कें; जानिए ड्रेनेज सिस्टम का सच

📍 स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश | 📂 श्रेणी: नागरिक मुद्दे एवं विशेष रिपोर्ट

लखनऊ: राजधानी लखनऊ में थोड़ी सी बारिश होते ही प्रमुख सड़कों से लेकर रिहायशी इलाकों तक पानी भर जाना एक स्थायी समस्या बन चुका है। मानसून आते ही हर बार दोष बादलों और मूसलाधार बारिश पर मढ़ दिया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जलभराव केवल प्राकृतिक बारिश का नतीजा है, या फिर नगर निगम की बदइंतजामी, चोक नालों और लचर ड्रेनेज व्यवस्था की गंभीर लापरवाही?

📌 जलभराव के प्रमुख कारण और व्यवस्थागत खामियां:

  • कूड़ा प्रबंधन की विफलता: नियमित उठान न होने से सड़कों का कचरा नालियों और सीवरों को चोक कर देता है।
  • नालियों को ढकना: सड़क व फुटपाथ निर्माण में नालियों को पक्का ढक दिया गया, जिससे सफाई और पानी का प्रवेश बाधित हुआ।
  • बेतरतीब सुंदरीकरण: निर्माण के दौरान जल निकासी के स्वाभाविक ढलान (Slope) और आउटलेट्स की अनदेखी।
  • जवाबदेही का अभाव: मॉनसून पूर्व सफाई के दावों और धरातल की स्थिति में भारी अंतर।

1. कूड़ा प्रबंधन की खामी और चोक होते नाले

शहर में नियमित कूड़ा उठान न होना जल निकासी के अवरुद्ध होने का सबसे बड़ा कारण है। सड़कों और फुटपाथों पर जमा पॉलिथीन व कचरा पहली ही बारिश में बहकर नालियों के मुहाने पर पहुंच जाता है। नालों के किनारे बने पनारे (Inlets) सिल्ट, गाद और कचरे से पट जाते हैं, जिससे सड़क का पानी मुख्य नाले तक पहुंच ही नहीं पाता।

2. नालियां ढक दीं, तो पानी जाएगा कहां?

शहर के कई इलाकों में विकास के नाम पर खुली नालियों को पूरी तरह कंक्रीट से ढककर फुटपाथ या सड़क चौड़ीकरण कर दिया गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि नालियों की तली तक सफाई और निरीक्षण असंभव हो गया। जब बारिश का पानी नालियों के अंदर जाने का प्राकृतिक रास्ता ही नहीं पाएगा, तो सड़कों पर सैलाब आना तय है।

3. बेतरतीब सुंदरीकरण और इंजीनियरिंग तालमेल की कमी

डिवाइडर, फुटपाथ और सड़क निर्माण के समय अक्सर वाटर फ्लो (Water Runoff) के तकनीकी डिजाइन की अनदेखी की जाती है।

  • कहीं फुटपाथ को जरूरत से ज्यादा ऊंचा कर दिया गया, जिससे कॉलोनियों का पानी मुख्य मार्ग पर रुक गया।
  • अलग-अलग विभागों (जैसे PWD, जल संस्थान और नगर निगम) के बीच समन्वय न होने से एक का निर्माण दूसरे की ड्रेनेज व्यवस्था को ब्लॉक कर देता है।
  • ठेकेदारों द्वारा किए जाने वाले कार्यों की जमीनी स्तर पर तकनीकी जांच का अभाव साफ नजर आता है।

अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होना जरूरी

जलभराव के बाद केवल पंप लगाकर पानी खींचना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। जवाबदेही के तहत यह सवाल पूछे जाने आवश्यक हैं:

"क्या मानसून से पहले सभी क्रिटिकल पॉइंट्स की पहचान की गई थी? क्या नालों की तलीझड़ सफाई की भौतिक जांच हुई? निर्माण के वक्त पानी के प्राकृतिक बहाव का ध्यान रखा गया या नहीं? जब तक इन सवालों पर जवाबदेही तय नहीं होगी, हर बारिश में शहर इसी तरह डूबेगा।"
निष्कर्ष: बारिश एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन जलभराव प्रशासनिक और इंजीनियरिंग स्तर की खामियों का नतीजा है। जरूरत सिर्फ बारिश के बाद पानी निकालने की नहीं, बल्कि ड्रेनेज सिस्टम के समग्र पुनर्गठन और सख्त निगरानी की है।

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