बैंकॉक में नाटक 'दूत वाक्यम्' की सफल प्रस्तुति: महाकवि भास व दिनकर की 'रश्मिरथी' का दिखा संगम; हिंदी विश्वविद्यालय की डॉ. विधु खरे दास ने प्रस्तुत किया शोध पत्र
वर्धा/बैंकॉक: थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक स्थित प्रतिष्ठित सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी (Silpakorn University) में आयोजित 'ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस - 2026' के अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय रंगमंच और क्लासिकल साहित्य की अनूठी छटा बिखरी। कोलाज कल्चरल सोसाइटी के तत्वावधान में महाकवि भास की अमर संस्कृत रचना और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' के सुप्रसिद्ध खंडकाव्य 'रश्मिरथी' पर आधारित नाटक 'दूत वाक्यम्' का सफल मंचन किया गया। इस वैश्विक सम्मेलन में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की सहायक प्रोफेसर डॉ. विधु खरे दास ने शोध पत्र भी प्रस्तुत किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने काफी सराहा।
📌 प्रस्तुति एवं सम्मेलन के प्रमुख बिंदु:
- अंतरराष्ट्रीय मंच: बैंकॉक की सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी में 'ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस 2026' के दौरान हुआ भव्य मंचन।
- साहित्यिक समन्वय: प्राचीन संस्कृत नाटककार महाकवि भास की कृति और आधुनिक हिंदी साहित्य के स्तंभ रामधारी सिंह 'दिनकर' की 'रश्मिरथी' का प्रभावी रूपांतरण।
- निर्देशन व परिकल्पना: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) के प्रदर्शनकारी कला विभाग की डॉ. विधु खरे दास और अनिमेष खरे दास का संयुक्त निर्देशन।
- एकल अभिनय का जादू: मंच पर एकल कलाकार पंकज कुमार पांडे ने अपनी प्रभावशाली अभिनय क्षमता और संवाद अदायगी से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
- अकादमिक योगदान: डॉ. विधु खरे दास द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र को अंतरराष्ट्रीय शोधार्थियों और प्राच्यविदों की व्यापक सराहना मिली।
📊 'दूत वाक्यम्' प्रस्तुति एवं दल: एक नजर में
| घटक / पहलू | विवरण |
|---|---|
| नाटक का शीर्षक | दूत वाक्यम् (Doot Vakyam) |
| मूल साहित्यिक आधार | महाकवि भास कृत संस्कृत नाटक एवं रामधारी सिंह 'दिनकर' कृत 'रश्मिरथी' |
| आयोजन एवं स्थल | ग्लोबल संस्कृत कॉन्फ्रेंस 2026, सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी, बैंकॉक (थाईलैंड) |
| परिकल्पना एवं निर्देशन | डॉ. विधु खरे दास (MGAHV वर्धा) एवं अनिमेष खरे दास |
| एकल अभिनय | पंकज कुमार पांडे (सोलो परफॉर्मेंस) |
| सहायक निर्देशन | डॉ. राघवेंद्र मिश्रा (शारदा यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा) |
| आयोजक संस्था | कोलाज कल्चरल सोसाइटी |
संस्कृत परंपरा और आधुनिक नाट्य दृष्टि का सुंदर समन्वय
'दूत वाक्यम्' महाभारत के उस महत्वपूर्ण प्रसंग को केंद्र में रखता है, जब भगवान श्रीकृष्ण शांति दूत बनकर कौरवों की सभा में पांडवों का अंतिम संदेश लेकर पहुंचते हैं। नाटक में महाकवि भास के शास्त्रीय शिल्प और दिनकर की ओजस्वी काव्य-भाषा 'कृष्ण की चेतावनी' के संवादों का ऐसा प्रभावोत्पादक ताना-बाना बुना गया, जिसने बैंकॉक के बहुसांस्कृतिक दर्शकों को गहरे तक प्रभावित किया।
"भारतीय शास्त्रीय नाट्य परंपरा में 'दूत वाक्यम्' कूटनीति, न्याय और नैतिक संकल्प का अनुपम आख्यान है। जब इसे वैश्विक दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तो भाषा की सीमाओं से परे मानवीय संवेदनाओं और अभिनय की शक्ति ने संवाद स्थापित किया।"
एकल अभिनेता पंकज कुमार पांडे ने मंच पर विभिन्न भाव-भंगिमाओं, आंगिक अभिनय और भावप्रवण वाचिक कला के जरिए सभा के तनाव, दुर्योधन के हठ और श्रीकृष्ण के विराट रूप की प्रतीकात्मक अनुभूति को साकार किया। इस प्रस्तुति में शारदा यूनिवर्सिटी (ग्रेटर नोएडा) के डॉ. राघवेंद्र मिश्रा ने सह-निर्देशक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डॉ. विधु खरे दास का शोध पत्र बना आकर्षण का केंद्र
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रदर्शनकारी कला विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत डॉ. विधु खरे दास ने न केवल नाटक की परिकल्पना की, बल्कि सम्मेलन के तकनीकी सत्र में अपना शोध पत्र भी वाचन किया।
उनके शोध पत्र में संस्कृत नाट्य परंपरा के समकालीन वैश्विक संदर्भों, नाट्यशास्त्र के तत्वों और आधुनिक रंगमंचीय प्रयोगों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। सम्मेलन में भाग ले रहे दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप और भारत के प्राच्यविदों तथा शोधार्थियों ने उनके शोध दृष्टि की सराहना की।
सांस्कृतिक सेतु बना भारतीय रंगमंच
कोलाज कल्चरल सोसाइटी और सिल्पाकोर्न यूनिवर्सिटी के इस संयुक्त मंच पर भारतीय संस्कृति, संस्कृत वांग्मय और रंगकर्म का यह संगम सांस्कृतिक कूटनीति की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। थाईलैंड की समृद्ध रामायण और संस्कृत परंपरा के बीच भारतीय कलाकारों की इस प्रस्तुति ने दोनों देशों के साझा सांस्कृतिक सूत्रों को और अधिक मजबूती प्रदान की।


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