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नहीं रहे 'क्रांतिवीर' नाना पाटेकर: गोवा स्थित आवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन; 3 बार के नेशनल अवॉर्ड विजेता का 75 वर्ष में महाप्रयाण

नहीं रहे दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर: 75 वर्ष की उम्र में गोवा में हुआ निधन; गंभीर दिल का दौरा पड़ने से सिनेमा जगत के 'क्रांतिवीर' ने ली अंतिम सांस

📍 स्थान: पणजी, गोवा / मुंबई | 📅 दिनांक: 08 अक्टूबर 2026 | 🎬 श्रेणी: बॉलीवुड ब्रेकिंग, भारतीय सिनेमा, श्रद्धांजलि एवं मनोरंजन जगत

गोवा/मुंबई: भारतीय सिनेमा के सबसे सशक्त और बहुमुखी अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा में 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, गोवा स्थित आवास पर उन्हें अचानक गंभीर दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ा। अचेत अवस्था में उन्हें तत्काल नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक सीपीआर देकर उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन सुबह उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत सहित पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है।

📌 नाना पाटेकर के निधन एवं सफर से जुड़े मुख्य बिंदु:

  • दुखद अवसान: 75 वर्ष की उम्र में गोवा में कार्डियक अरेस्ट के चलते हुआ देहांत।
  • परिवार: उनके बेटे मल्हार पाटेकर को सूचना मिलने के बाद वे गोवा रवाना हुए।
  • तीन राष्ट्रीय पुरस्कार: 'परिंदा' (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता), 'क्रांतिवीर' (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) और 'अग्निसाक्षी' (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता) के लिए नेशनल अवॉर्ड से नवाजे गए।
  • पद्म श्री सम्मान: भारतीय कला एवं सिनेमा में अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2013 में 'पद्म श्री' से अलंकृत किया था।
  • सामाजिक सरोकार: किसानों की आत्महत्या और सूखे से निपटने के लिए स्थापित 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) के जरिए जीवन भर समाजसेवा में समर्पित रहे।

📊 नाना पाटेकर: जीवन व सिनेमाई यात्रा एक नजर में

पहलू विवरण
मूल नाम विश्वनाथ पाटेकर
जन्म एवं उम्र 1 जनवरी 1951 | 75 वर्ष
निधन की तिथि व स्थान 08 अक्टूबर 2026, गोवा
प्रमुख हिंदी फिल्में क्रांतिवीर, परिंदा, प्रहार, तिरंगा, खामोशी, अब तक छप्पन, वेलकम, राजनीति
प्रमुख मराठी फिल्में नटसम्राट, सिंहासन, देउळ बंद, डॉ. प्रकाश बाबा आमटे
नागरिक सम्मान पद्म श्री (2013) एवं 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

अनोखी संवाद अदायगी और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस

नाना पाटेकर ने 1970 के दशक में मराठी थियेटर और फिल्मों से अपने अभिनय की शुरुआत की थी। हिंदी सिनेमा में उन्होंने कभी भी परंपरागत हीरो की छवि में बंधना स्वीकार नहीं किया। उनकी तेज-तर्रार संवाद अदायगी, चेहरे के तीखे भाव और यथार्थवादी अभिनय ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया।

“ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून... बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा?” — फिल्म ‘क्रांतिवीर’ का यह संवाद भारतीय सिनेमा के इतिहास में सामाजिक एकता और राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।

चाहे 'तिरंगा' में ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के सामने इंस्पेक्टर वागले की बेबाकी हो, 'अब तक छप्पन' में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट साधु आगाशे का शांत पर खतरनाक रूप, या फिर 'वेलकम' में डॉन उदय शेट्टी का कॉमिक अंदाज—नाना पाटेकर हर किरदार में पूरी तरह रच-बस जाते थे।

पर्दे के बाहर मसीहा: 'नाम फाउंडेशन' से किसानों को दिया सहारा

नाना पाटेकर केवल एक महान अभिनेता ही नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े संवेदनशील समाजसेवी थे। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में सूखे और कर्ज से परेशान किसानों की आत्महत्याओं ने जब उन्हें झकझोरा, तो उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की स्थापना की।

उन्होंने अपनी निजी कमाई का बड़ा हिस्सा गांवों में जल संरक्षण, चेक डैम निर्माण और पीड़ित किसान परिवारों के पुनर्वास में लगाया। उनका सादा जीवन और किसानों के प्रति समर्पण सदैव प्रेरणा देता रहेगा।

सिनेमा और राजनीतिक जगत में शोक की लहर

नाना पाटेकर के अचानक चले जाने से बॉलीवुड, मराठी फिल्म उद्योग और राजनीति की प्रमुख हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। सोशल मीडिया पर सह-कलाकारों, निर्देशकों और देश भर के करोड़ों प्रशंसकों द्वारा उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है।

अपूरणीय क्षति: भारतीय सिनेमा के इतिहास में नाना पाटेकर का स्थान कोई दूसरा नहीं ले सकता। उनका बेबाक अंदाज, अभिनय का जुनून और सामाजिक सरोकार उन्हें आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जीवित रखेगा।

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