Aliganj Fire Case: अलीगंज अग्निकांड में नया मोड़; विद्युत संघर्ष समिति का बड़ा आरोप- निर्दोष इंजीनियर को बनाया बलि का बकरा, हड़ताल की चेतावनी
लखनऊ। अलीगंज स्थित एक कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड (जिसमें 15 मासूम बच्चों की दर्दनाक मृत्यु हो गई थी) के बाद अब बिजली विभाग के भीतर एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सीधे तौर पर 'विद्युत सुरक्षा निदेशालय' पर अपने लापरवाह अधिकारियों को बचाने और पॉवर कॉरपोरेशन के एक निर्दोष अधिशासी अभियंता (XEN) को जबरन बलि का बकरा बनाने का संगीन आरोप लगाया है।
संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि आधी रात को दफ्तर खोलकर किए गए अधिशासी अभियंता के इस अन्यायपूर्ण और अवैधानिक निलंबन को तत्काल वापस लिया जाए। समिति ने साफ किया है कि यदि वास्तविक दोषियों को छुपाकर निर्दोषों पर कार्रवाई की गई, तो ऊर्जा कर्मी चुप नहीं बैठेंगे।
अलीगंज अग्निकांड: विद्युत सुरक्षा निदेशालय बनाम संघर्ष समिति के तकनीकी तथ्य
इस पूरे विवाद और नियमों की हकीकत को समझने के लिए नीचे दी गई तुलनात्मक तालिका को देखें:
| विवाद का मुख्य बिंदु | संघर्ष समिति और रिकॉर्ड के अनुसार वास्तविक तथ्य |
|---|---|
| विद्युत सुरक्षा एनओसी (NOC) | उपभोक्ता ने 23 जून 2016 को SBI चालान से ₹1150 शुल्क ट्रेजरी में जमा किया था। 24 जून 2016 को एनओसी जारी हुई। निदेशालय इसे फर्जी बताकर अपने तत्कालीन अधिकारियों को बचा रहा है। |
| समय-समय पर निरीक्षण (Audits) | नियमतः वर्ष 2016 के बाद 2019, 2022 और 2026 में भी विद्युत सुरक्षा निरीक्षण होना चाहिए था, जो निदेशालय के अधिकारियों ने नहीं किया। इसी लापरवाही से हादसा हुआ। |
| ओवरलोड (3 माह से अधिक लोड) | रिकॉर्ड के अनुसार लोड अप्रैल में 24.30 KW, मई में 28.66 KW और जून में 34.18 KW दर्ज हुआ। जून का डेटा जुलाई के मास्टर डेटा में आता, जिसके बाद जुलाई में ही नोटिस जारी होना था। उससे पहले निलंबन नियमों के खिलाफ है। |
| निलंबन की प्रक्रिया | बिना किसी निष्पक्ष जांच के, आधी रात को दफ्तर खोलकर आनन-फानन में अधिशासी अभियंता को सस्पेंड किया गया। |
दस्तावेजों ने खोली पोल: 2016 में जमा हुआ था निरीक्षण शुल्क
उप्राविप अभियंता संघ के महासचिव जितेन्द्र सिंह गुर्जर द्वारा सार्वजनिक किए गए आधिकारिक दस्तावेजों के हवाले से संघर्ष समिति ने बताया कि संबंधित कोचिंग परिसर के मालिक द्वारा 20 किलोवाट के कमर्शियल कनेक्शन के लिए साल 2016 में ही तय शुल्क सरकारी खजाने में जमा कराया गया था। नियमानुसार यदि शुल्क जमा होने के 7 दिनों के भीतर विद्युत सुरक्षा निदेशालय एनओसी जारी नहीं करता है, तो पावर कॉरपोरेशन के इंजीनियर कनेक्शन चालू करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। ऐसे में अब निदेशालय द्वारा एनओसी के रिकॉर्ड न होने या उसे फर्जी बताना केवल अपनी खाल बचाने की कोशिश है।
लोड बढ़ने के आरोपों को बताया पूरी तरह तथ्यहीन
अभियंता पर लगे 'तीन महीने से अधिक स्वीकृत लोड चलाने पर कार्रवाई न करने' के आरोप को खारिज करते हुए समिति ने स्पष्ट किया कि बिजली विभाग के बिलिंग सिस्टम में तीन महीने के लगातार बढ़े लोड का आकलन मासिक डेटा क्लोजर के बाद होता है। जून 2026 की अधिकतम मांग (34.18 किलोवाट) जुलाई के मास्टर डेटा में रिफ्लेक्ट होनी थी, जिसके बाद ही विधिक नोटिस भेजने की समय-सीमा शुरू होती। जुलाई आने से पहले ही जून के अंत में अधिकारी को सस्पेंड कर देना पूरी तरह से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संघर्ष समिति की प्रमुख मांगें:
बिजली विभाग के सभी संगठनों की संयुक्त समिति ने इस संबंध में सूबे के मुखिया के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं:
- ऊर्जा निगम के अधिशासी अभियंता का अन्यायपूर्ण एवं अवैधानिक निलंबन आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।
- 15 बच्चों की मौत के जिम्मेदार असली दोषियों (विद्युत सुरक्षा निदेशालय के लापरवाह ऑडिटर्स) की जांच कर उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक व कानूनी कार्रवाई की जाए।
- भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में सभी व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों का एक विशेष 'विद्युत सुरक्षा ऑडिट अभियान' चलाया जाए।


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