अलीगंज अग्निकांड: अवैध निर्माण पर हुआ ध्वस्तीकरण का आदेश 2 महीने के भीतर कैसे हुआ निरस्त? एलडीए के दस्तावेज खोल रहे पोल
लखनऊ (22 जून): अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बाद अब उस विवादित भवन से जुड़े पुराने सरकारी दस्तावेज और लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की संदिग्ध कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। सोमवार को जिस इमारत में आग लगने की दुःखद घटना हुई, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में ही अवैध निर्माण को लेकर आधिकारिक रूप से ध्वस्तीकरण (Demolition) का आदेश जारी किया गया था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि महज दो महीने से भी कम समय के भीतर खेल हो गया और उस सख्त आदेश को ठंडे बस्ते में डालते हुए निरस्त कर दिया गया।
📜 1980 से लेकर अब तक: भवन का पूरा विवादित इतिहास:
- 11 जुलाई 1980 (पहला आवंटन): अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या MS/102/D मूल रूप से लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार (पुत्र रामेश्वर सहाय) को किराया-क्रय पद्धति पर आवंटित हुआ था, जिसका कब्जा 4 नवंबर 1980 को सौंपा गया।
- वर्ष 2005 से 2013 (बिक्री का खेल): 2005 में यह भवन विक्रय विलेख के जरिए विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को इसे वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला के नाम बेच दिया गया।
- अगस्त 2014 (नक्शा पास): एलडीए ने 7 अगस्त 2014 को वीरेन्द्र व सुरेन्द्र के पक्ष में नामांतरण किया। इसके बाद करीब **1992 वर्गफीट** क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र 20 अगस्त 2014 को 'स्वतः मानचित्र योजना' के तहत केवल **आवासीय उपयोग** के लिए स्वीकृत कराया गया था।
मुकदमा नंबर-08/2016: दो महीने में कैसे पलट गया फैसला?
आवासीय नक्शा पास कराकर जब भवन में बड़े पैमाने पर अनधिकृत (अवैध) निर्माण कार्य शुरू किया गया, तब एलडीए की नींद टूटी। प्राधिकरण ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ **मुकदमा संख्या-08/2016** दर्ज कराया। मामले की गहन जांच के बाद विहित प्राधिकारी ने **10 मई 2016** को इस अवैध निर्माण के विरुद्ध ध्वस्तीकरण (बिल्डिंग गिराने) का कड़ा आदेश पारित कर दिया था।
"सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल यही है कि जो अवैध निर्माण 10 मई 2016 को प्राधिकरण की नजर में इतना गंभीर था कि उसे गिराने का आदेश देना पड़ा, वो महज दो महीने के अंदर यानी 5 जुलाई 2016 को अचानक वैध या नजरअंदाज करने लायक कैसे हो गया? इस आदेश को निरस्त करने के पीछे एलडीए के किन अफसरों की सरपरस्ती थी, अब इसकी जांच होनी तय है।"
🔎 जांच के घेरे में जिम्मेदार अफसर
सोमवार को हुए इस भीषण अग्निकांड ने साबित कर दिया है कि अगर साल 2016 में एलडीए ने अपने ही ध्वस्तीकरण के आदेश पर ईमानदारी से अमल किया होता, तो आज यह दर्दनाक हादसा टाला जा सकता था। घटना के बाद अब शासन स्तर पर इस बात की फाइलें दोबारा खंगाली जा रही हैं कि आखिर किसके दबाव या प्रभाव में आकर 5 जुलाई 2016 को ध्वस्तीकरण आदेश निरस्त किया गया।



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