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लखनऊ लोहिया संस्थान में पहली बार सफल हुई IPC तकनीक, फेफड़ों के कैंसर मरीजों को मिली बड़ी राहत

स्वास्थ्य समाचार | 17 जून, 2026

RMLIMS में पहली बार IPC प्रक्रिया सफल: फेफड़ों के कैंसर मरीजों को बड़ी राहत, अब घर पर ही निकल सकेगा फेफड़ों का पानी

Lohia Institute Lucknow IPC Procedure Lung Cancer Patient Treatment RMLIMS

लखनऊ: डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS), लखनऊ के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ने चिकित्सा क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान में फेफड़ों के कैंसर एवं अन्य घातक रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए पहली बार इंडवेलिंग प्लूरल कैथेटर (Indwelling Pleural Catheter - IPC) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। इस आधुनिक तकनीक के आने से अब गंभीर मरीजों को फेफड़ों में बार-बार पानी भरने की समस्या (Malignant Pleural Effusion) के इलाज के लिए बार-बार अस्पताल नहीं दौड़ना पड़ेगा।

बार-बार अस्पताल आने और इन्फेक्शन के खतरे से मुक्ति

पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष (HOD) डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बताया कि यह प्रक्रिया ऐसे मरीजों के लिए वरदान है जिनके फेफड़ों के आसपास बार-बार द्रव (पानी) जमा हो जाता है, जिससे उन्हें सांस लेने में गंभीर तकलीफ होती है। पारंपरिक उपचार में मरीज को हर 4-5 दिन में अस्पताल आकर सुई के जरिए पानी निकलवाना पड़ता था। लेकिन IPC तकनीक में मरीज की प्लूरल कैविटी में एक विशेष छोटा कैथेटर (ट्यूब) स्थायी रूप से स्थापित कर दिया जाता है, जिससे आवश्यकतानुसार घर पर ही या आसानी से द्रव निकाला जा सकता है।

गोंडा के स्टेज-4 कैंसर मरीज पर हुआ सफल प्रयोग:

डॉ. हेमंत कुमार ने बताया कि संस्थान में आया एक मरीज जो जनपद गोंडा का निवासी था, स्टेज-4 कैंसर से पीड़ित था। सांस फूलने की गंभीर शिकायत के कारण उसे हर 4 से 5 दिन में गोंडा से लखनऊ आकर फेफड़ों का पानी निकलवाना पड़ता था, जो उसके और परिवार के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से बेहद कठिन था। बार-बार सुई लगाने से संक्रमण (Infection) का खतरा भी रहता था। इस सफल प्रक्रिया के बाद अब मरीज को इस असहनीय दर्द और भागदौड़ से परमानेंट राहत मिल गई है।

'ऑटोप्ल्यूरोडेसिस' से स्थायी रूप से रुक सकता है पानी बनना

विशेषज्ञों के मुताबिक, आईपीसी (IPC) तकनीक का एक और जबरदस्त वैज्ञानिक लाभ ऑटोप्ल्यूरोडेसिस (Autopleurodesis) है। इस प्रक्रिया के माध्यम से फेफड़ों को घेरने वाली दोनों झिल्लियां (जिनके बीच पानी बनता है), धीरे-धीरे समय के साथ आपस में चिपक जाती हैं। झिल्लियों के आपस में चिपकने से वहां दोबारा फ्लूइड या पानी बनने की प्रक्रिया हमेशा के लिए बंद हो सकती है, जिससे मरीज को दीर्घकालिक राहत मिलती है।

लोहिया संस्थान के निदेशक ने इस ऐतिहासिक सफलता पर पल्मोनरी मेडिसिन विभाग की पूरी टीम को बधाई दी और कहा कि आरएमएलआईएमएस उत्तर प्रदेश के मरीजों को बेहद सुलभ और अंतरराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस सफल ऑपरेशन को अंजाम देने वाली ओटी (OT) टीम:

डॉक्टर्स: डॉ. अजय कुमार वर्मा (HOD), डॉ. हेमंत कुमार अग्रवाल, डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. सुलक्षणा गौतम, डॉ. पुलकित गुप्ता, डॉ. सागर जैन, डॉ. कनक वर्मा।
पैरामेडिकल स्टाफ: वंदना, मनीष, पिंकी, सुमन, आरती और रामेश्वर।

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