TET लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को मिले स्थायी राहत: अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने खोला मोर्चा, देशव्यापी प्रदर्शन
लखनऊ: शिक्षा का अधिकार (RTE) एक्ट लागू होने से पूर्व से विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता थोपने के विरोध में पूरे देश के शिक्षक समुदाय में भारी आक्रोश है। इसके खिलाफ अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के आह्वान पर उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के सभी जिला मुख्यालयों पर हजारों शिक्षकों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारियों को सौंपा गया, जिसमें संसद से आरटीई एक्ट में विधायी संशोधन की मांग की गई है।
14 लाख शिक्षकों की आजीविका पर संकट, क्यों पैदा हुई यह स्थिति?
राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष संजय मेधावी ने कहा कि इस समय देश भर के लगभग 14 लाख शिक्षकों में गहरी चिंता, मानसिक पीड़ा और असुरक्षा की भावना बनी हुई है। इसका मुख्य कारण निम्नलिखित नीतियां और अदालती फैसले हैं:
- 23 अगस्त 2010: NCTE द्वारा जारी की गई टीईटी संबंधी अधिसूचना।
- 9 अगस्त 2017: केंद्र सरकार द्वारा आरटीई एक्ट के सेक्शन 23(2) में किया गया संशोधन।
- सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले: माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1 सितंबर 2025 और पुनर्विचार याचिका पर 29 मई 2026 को दिए गए निर्णयों के बाद परिस्थितियां गंभीर हो गई हैं।
इन वजहों से वर्ष 2010 से पूर्व और उत्तर प्रदेश में टीईटी लागू होने की तिथि 27 जुलाई 2011 से पहले विधिवत नियुक्त हो चुके शिक्षकों की सेवा-सुरक्षा और रोजी-रोटी पर अचानक संकट आ खड़ा हुआ है।
"बाद में बने नियम पुरानी नियुक्तियों पर लागू करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ"
प्रदेश महामंत्री जोगेंद्र पाल सिंह ने प्रशासनिक और विधिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी नियम या नीति उसके लागू होने की तारीख से प्रभावी होती है (Prospective Effect)। पूर्व में पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत दी गई नौकरियों और अर्जित किए गए सेवा-अधिकारों पर बाद में तय किए गए पात्रता मानदंडों को बैकडेट से लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता और विधिक निश्चितता के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
शिक्षकों की मुख्य मांगें:
- स्थायी राहत: टीईटी लागू होने की तिथि (यूपी में 27 जुलाई 2011) से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से पूरी तरह और स्थायी रूप से मुक्त रखा जाए।
- संसद में विधायी संशोधन: भारत सरकार और संसद जनहित में हस्तक्षेप करते हुए आरटीई (RTE) अधिनियम में आवश्यक विधायी संशोधन या विशेष प्रावधान लाए।
- सेवा सुरक्षा: दशकों से राष्ट्र निर्माण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे रहे वरिष्ठ शिक्षकों की आजीविका और सेवा अधिकारों को पूर्ण संरक्षण दिया जाए।
प्राथमिक संवर्ग के प्रदेश अध्यक्ष शिवशंकर सिंह और प्रदेश महामंत्री प्रदीप तिवारी ने सरकार की संवेदनशीलता पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश का शिक्षक समुदाय न्याय की उम्मीद कर रहा है। ज्ञापन सौंपने के दौरान प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. उदयन मिश्रा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. कमल कौशिक, कोषाध्यक्ष नीलमणि शुक्ला, मीडिया प्रभारी बृजेश श्रीवास्तव, मंत्री डॉ. श्वेता, संयुक्त मंत्री सोनल शर्मा, रविन्द्र पंवार, प्रियंका शुक्ला, सह मीडिया प्रभारी संजय शर्मा, डॉ. बजरंग बहादुर सिंह, रुचि अरोरा सहित जिला, ब्लॉक और नगर इकाइयों के पदाधिकारी और हजारों की संख्या में शिक्षक उपस्थित रहे।


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