सिविल अस्पताल की नई स्ट्रोक यूनिट में चमत्कार: समय पर मिले rTPA इलाज से महिला कर्मी की लौटी आवाज और हाथ-पैर की ताकत; 4.5 घंटे का 'गोल्डन पीरियड' बना वरदान
लखनऊ: राजधानी के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) चिकित्सालय में नव-प्रारंभ स्ट्रोक यूनिट ब्रेन अटैक के मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है। अस्पताल की एक 42 वर्षीय महिला सफाई कर्मी को ड्यूटी समाप्त होते ही अचानक एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक (Acute Ischemic Stroke) का दौरा पड़ा। तत्परता दिखाते हुए नर्सिंग और मेडिकल टीम ने त्वरित सीटी स्कैन (CT Brain) कर 4.5 घंटे की समय-सीमा के भीतर rTPA थ्रोम्बोलिसिस (Thrombolysis) थेरेपी दी, जिसके मात्र दो घंटे के भीतर मरीज की आवाज लौट आई और लकवाग्रस्त अंगों में पुनः जान आ गई।
📌 सिविल अस्पताल स्ट्रोक यूनिट की मुख्य विशेषताएं:
- समर्पित आईसीयू: स्ट्रोक मरीजों के लिए ICU में 5 विशेष आरक्षित बेड।
- 24×7 डायग्नोस्टिक्स: 24 घंटे आपातकालीन CT Scan और त्वरित रिपोर्टिंग की सुविधा।
- निःशुल्क rTPA इंजेक्शन: अस्पताल निदेशक के निर्देश पर अत्यंत महंगी थ्रोम्बोलिटिक दवा पात्र मरीजों को पूरी तरह मुफ्त।
- गोल्डन ऑवर प्रोटोकॉल: लक्षण दिखने के 4.5 घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचने पर स्थायी विकलांगता और मृत्यु से बचाव संभव।
ड्यूटी के दौरान बिगड़ी तबीयत, सिस्टर पुष्पा की सतर्कता से बची जान
अस्पताल में कार्यरत 42 वर्षीय महिला कर्मी ड्यूटी खत्म होने के समय अचानक बेहोश हो गईं। सहकर्मियों ने उन्हें तुरंत आईसीयू पहुंचाया। होश में आने पर मरीज की आवाज जा चुकी थी और दाहिना हाथ-पैर पूरी तरह शिथिल हो चुका था।
आईसीयू सिस्टर इंचार्ज पुष्पा ने स्ट्रोक के लक्षणों को तत्काल भांपते हुए न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी को सूचित किया। बिना एक मिनट गंवाए तुरंत सीटी स्कैन कराया गया। दिमाग में कोई रक्तस्राव (हेमरेज) न दिखने पर तुरंत rTPA थ्रोम्बोलिसिस प्रक्रिया शुरू की गई। करीब दो घंटे के अंदर महिला बोलने लगीं और उनके अंगों की कार्यक्षमता पूरी तरह बहाल हो गई।
गोल्डन पीरियड (4.5 घंटे) में हर मिनट है अनमोल: डॉ. विनोद तिवारी
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी ने बताया कि एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक में दिमाग की नस में खून का थक्का जम जाता है।
"भारत सरकार की गाइडलाइंस के अनुसार स्ट्रोक के लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे (4.5 Hours) का समय 'गोल्डन पीरियड' कहलाता है। इस अवधि में थ्रोम्बोलिसिस इंजेक्शन देने से खून का थक्का घुल जाता है और ब्रेन डैमेज होने से बच जाता है। स्ट्रोक की स्थिति में हर मिनट लाखों न्यूरॉन्स नष्ट होते हैं, इसलिए झाड़-फूंक या घरेलू नुस्खों में वक्त बर्बाद किए बिना तुरंत सीटी स्कैन सुविधा वाले बड़े अस्पताल पहुंचना चाहिए।"
— डॉ. विनोद कुमार तिवारी (न्यूरोसर्जन, सिविल अस्पताल)
स्ट्रोक की पहचान के लिए 'FAST' फॉर्मूला याद रखें
- F (Face Drooping): मुस्कुराने पर चेहरा या मुंह एक तरफ झुकना या टेढ़ा होना।
- A (Arm Weakness): दोनों हाथ उठाने पर एक हाथ या पैर का नीचे गिरना या कमजोरी महसूस होना।
- S (Speech Difficulty): आवाज लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना या अचानक पूरी तरह बोलना बंद हो जाना।
- T (Time to Call Emergency): इनमें से कोई भी लक्षण दिखते ही बिना देर किए तुरंत मरीज को अस्पताल पहुंचाएं।
स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारक: इन बीमारियों वाले रहें सतर्क
सिविल अस्पताल के निदेशक डॉ. जी.पी. गुप्ता ने बताया कि निम्नलिखित स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित व्यक्तियों में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है:
- उच्च रक्तचाप (Hypertension): अनियंत्रित बीपी दिमाग की नसों को नुकसान पहुंचाता है।
- मधुमेह (Diabetes) एवं मोटापा (Obesity): ब्लड शुगर और बढ़ा हुआ वजन धमनियों को ब्लॉक कर सकता है।
- हाई कोलेस्ट्रॉल (Hypercholesterolemia): नसों में प्लाक बनने से थक्का जमने का जोखिम।
- हृदय रोग (Valvular Heart Disease): दिल के वाल्व से जुड़े रोगों में थ्रोम्बोइम्बोलिज्म (खून के थक्के का दिमाग में पहुंचना) का खतरा बढ़ जाता है।
- उम्र: 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को नियमित मेडिकल चेकअप कराना चाहिए।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी.के. पाण्डेय एवं अधीक्षक डॉ. एस.आर. सिंह ने सफल उपचार और समयबद्ध रिस्पॉन्स के लिए चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, आईसीयू और रेडियोलॉजी टीम की सराहना की।

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