'यूपी के गांवों की तरह असम में भी जीवंत है अपनी मिट्टी और संस्कृति': राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने साझा कीं लखनऊ व काशी की स्मृतियां; लोक भवन में यूपी मीडिया दल से संवाद
गुवाहाटी: उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी काशी (वाराणसी) से गहरा नाता रखने वाले असम के माननीय राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने कहा है कि असम का भौतिक विकास और यहां की प्राचीन विरासत, भाषा, लोककला व परंपराओं का संरक्षण साथ-साथ चलना चाहिए। पत्र सूचना कार्यालय (PIB), लखनऊ के नेतृत्व में असम-मेघालय मीडिया टूर पर गुवाहाटी पहुंचे उत्तर प्रदेश के 13 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल से लोक भवन (राजभवन) में आत्मीय संवाद करते हुए राज्यपाल ने कहा कि जिस तरह यूपी के गांवों में बोली, लोकसंस्कृति और खान-पान जीवंत है, ठीक उसी तरह असम ने भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मिट्टी की खुशबू को बेहद मजबूती से संजोकर रखा है।
📌 राज्यपाल संवाद एवं प्रमुख पहलों के मुख्य बिंदु:
- सांस्कृतिक एकात्मता: उत्तर प्रदेश और असम की लोक परंपराएं भौगोलिक दूरी के बावजूद 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के सूत्र में बंधी हैं।
- यादों के झरोखे से: लखनऊ के दारुलशफा के दिन, विधानसभा की स्मृतियां और हजरतगंज की प्रसिद्ध 'शर्मा जी की चाय' की मिठास को याद किया।
- ब्रह्मपुत्र और मां कामाख्या: ब्रह्मपुत्र केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि असम की आत्मा, जीवनधारा और ‘नाद ब्रह्म’ का प्रतीक है।
- ‘अमर माटी-अमर नायक’: समाज के गुमनाम समाजसेवियों, कलाकारों और नायकों को पहचान दिलाने हेतु राजभवन की ऐतिहासिक पहल।
- भाषा व शिक्षा संवर्धन: असम भाषा प्रोत्साहन योजना, एक्सीलेंस अवार्ड्स और 95 वर्षीय वरिष्ठ सेवानिवृत्त शिक्षक नवीन जोशी का घर जाकर सम्मान।
📊 लोक भवन (राजभवन असम) की प्रमुख जनकल्याणकारी व सांस्कृतिक पहलें
| योजना / पहल का नाम | उद्देश्य एवं प्रभाव क्षेत्र |
|---|---|
| अमर माटी-अमर नायक | समाज सेवा, खेल, संस्कृति और साहित्य में निस्वार्थ काम करने वाले गुमनाम नायकों की पहचान व युवा पीढ़ी को उनकी प्रेरक गाथाओं से जोड़ना |
| गवर्नर असम भाषा प्रोत्साहन योजना | असम की समृद्ध भाषाई विविधता, स्थानीय बोलियों और पांडुलिपियों का संरक्षण व प्रसार |
| गवर्नर असम अवार्ड फॉर एक्सीलेंस | विभिन्न विधाओं और शोध कार्यों में उत्कृष्ट योगदान देने वाली राज्य की प्रतिभाओं का सम्मान |
| वरिष्ठ शिक्षक सम्मान पहल | आजीवन शिक्षा की अलख जगाने वाले 95 वर्षीय शिक्षक नवीन चंद्र जैसे वरिष्ठ गुरुजनों का चरण वंदन व सत्कार |
दारुलशफा के दिन और 'शर्मा जी की चाय' की मिठास
उत्तर प्रदेश से पहुंचे पत्रकारों से संवाद करते हुए राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य भावुक स्मृतियों में लौट आए। उन्होंने वाराणसी (काशी) की गलियों, गंगा घाटों और लखनऊ में बिताए राजनीतिक व सामाजिक जीवन के दिनों को विस्तार से साझा किया।
"लखनऊ के दारुलशफा में बिताए गए दिन और वहां का वैचारिक मंथन आज भी मानस पटल पर ताजा है। जब भी लखनऊ की चर्चा होती है, 'शर्मा जी की चाय' की सौंधी खुशबू और मिठास याद आ जाती है। उत्तर प्रदेश और असम की भौगोलिक दूरी भले हो, लेकिन दोनों की आत्मा एक है—यह संस्कृति, अपनापे और लोक आस्था का अटूट संगम है।"
— लक्ष्मण प्रसाद आचार्य (राज्यपाल, असम)
मां कामाख्या की शक्तिपीठ और ब्रह्मपुत्र की जीवनधारा
राज्यपाल ने असम की आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह शक्ति स्वरूपा मां कामाख्या की पावन धरा है। असम केवल प्राकृतिक सौंदर्य या पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का संगीत, नृत्य, सत्रीय परंपरा और जनजातीय विविधता इसे अद्वितीय बनाती है।
पवित्र ब्रह्मपुत्र का विशेष उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:
- नाद ब्रह्म का स्वरूप: ब्रह्मपुत्र केवल जल की धारा नहीं है, यह समूचे पूर्वोत्तर की सभ्यता, संगीत और चेतना का प्रवाह है।
- सह-अस्तित्व की सीख: जिस प्रकार गंगा-यमुना भारत के हृदय को सींचती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मपुत्र ने असमिया जीवन और 'भात-तरकारी' जैसी सहज जीवनशैली को आकार दिया है।
- लोकजीवन की पहचान: असम के गांवों में आज भी पारंपरिक आतिथ्य और लोक कलाएं आधुनिकता के प्रभाव से अप्रभावित रहकर जीवंत हैं।
विकास और विरासत का संतुलन: 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत'
राज्यपाल ने कहा कि आज का असम आधुनिक बुनियादी ढांचे, विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी, नए हवाई अड्डों और बेहतर राजमार्गों के साथ 'विकसित भारत' के संकल्प को गति दे रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि विकास की दौड़ में प्राचीन विरासत को सुरक्षित रखना ही वास्तविक प्रगति है।
उन्होंने लोक भवन को जनता और संवाद का सच्चा केंद्र बताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती आम जनमानस से निरंतर संवाद और समाज के अंतिम व्यक्ति के योगदान को सम्मान देने में ही निहित है।


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