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MGAHV वर्धा में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जयंती पर विशेष व्याख्यान: साहित्य के स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता और लोकमंगल पर मंथन

हिंदी विश्वविद्यालय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जयंती पर विशेष व्याख्यान: “शुक्ल जी के साहित्य ने समाज को आत्महीनता की ग्रंथि से निकाला” — प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त

📍 स्थान: वर्धा (महाराष्ट्र) | 📅 दिनांक: 08 अक्टूबर 2026 | 📚 श्रेणी: हिंदी साहित्य, अकादमिक व्याख्यान, आलोचना दृष्टि एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य विभाग की ओर से कालजयी समीक्षक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती के उपलक्ष्य में 'साहित्य के स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता और आचार्य रामचंद्र शुक्ल' विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के महादेवी वर्मा सभागार में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष एवं डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि आचार्य शुक्ल ने अपनी मौलिक आलोचना दृष्टि से भारतीय समाज को औपनिवेशिक व बौद्धिक आत्महीनता की ग्रंथि से बाहर निकालने का ऐतिहासिक कार्य किया।

📌 व्याख्यान के मुख्य वैचारिक बिंदु:

  • देशबोध से विश्वबोध: प्रो. गुप्त ने रेखांकित किया कि विश्वबोध का सच्चा मार्ग देशबोध से होकर निकलता है; भारत के स्वत्व की रक्षा सर्वोपरि है।
  • आलोचना की स्वतंत्र सत्ता: आचार्य शुक्ल रचना के साथ-साथ आलोचना के क्षेत्र में भी विदेशी दबावों से मुक्त स्वतंत्र सत्ता के पक्षधर थे।
  • विदेशी चिंतकों से संवाद: वे पहले भारतीय आलोचक थे जिन्होंने पाश्चात्य विद्वानों की नकल करने के बजाय उनके सिद्धांतों से तार्किक संवाद किया।
  • लोकमंगल की साधना: साहित्य में कल्पना को साध्य न मानकर केवल साधन माना और लोकमंगल की साधनावस्था को सर्वोच्च अधिमान दिया।

📊 व्याख्यान सत्र: एक नजर में

घटक / पहलू विवरण
व्याख्यान का विषय साहित्य के स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता और आचार्य रामचंद्र शुक्ल
मुख्य वक्ता प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त (पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष, UP हिंदी संस्थान)
स्थान व सभागार महादेवी वर्मा सभागार, MGAHV वर्धा
आयोजक विभाग हिंदी साहित्य विभाग, MGAHV वर्धा (अध्यक्ष: प्रो. प्रीति सागर)
केंद्रीय चिंतन भारतीय आदर्श, कर्मवाद, लोकमंगल एवं सांस्कृतिक स्वाधीनता

आलोचना में भारतीय स्वत्व और सांस्कृतिक चेतना

प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने अपने मुख्य संबोधन में आचार्य शुक्ल की समग्र साहित्यिक और आलोचनात्मक दृष्टि का सांगोपांग विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि शुक्ल जी केवल रचना ही नहीं, बल्कि आलोचना के प्रतिमानों में भी भारतीय दृष्टि की संप्रभुता स्थापित करना चाहते थे।

“आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रथम ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने पाश्चात्य विचारकों के सिद्धांतों को बिना परखे स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनसे आंख मिलाकर बौद्धिक संवाद स्थापित किया। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के लिए पारिभाषिक शब्दावली गढ़ी और साहित्य को कर्मवाद तथा भारतीय आदर्शों से जोड़कर लोकमंगल का माध्यम बनाया।”
— प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त

दीप प्रज्वलन व प्रस्ताविकी

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पण के साथ हुई। हिंदी साहित्य विभाग की अध्यक्षा प्रो. प्रीति सागर ने स्वागत भाषण और विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने प्रो. गुप्त का स्वागत पारंपरिक सूतमाला एवं विश्वविद्यालय का स्मृति चिह्न भेंट कर किया।

विद्वतजन एवं शोधार्थियों की गरिमामयी उपस्थिति

सत्र का कुशल संचालन हिंदी साहित्य विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रूपेश कुमार सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार द्वारा प्रस्तुत किया गया।

उपस्थित गणमान्य: इस बौद्धिक विमर्श में कालिंदी गुप्त, प्रो. श्यामसुंदर पाण्डेय, डॉ. रामानुज अस्थाना, डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा, डॉ. शैलेश मरजी कदम, डॉ. कोमल कुमार परदेशी सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

निष्कर्ष: आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि आज भी भारतीय साहित्य को वैचारिक गुलामी से मुक्त रखने और लोकमंगलकारी दृष्टि प्रदान करने में सबसे प्रासंगिक प्रकाशस्तंभ है।

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