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POCSO Act Awareness: लखनऊ DLSA ने स्कूली बच्चों को सिखाए आत्मरक्षा व सुरक्षा के कानूनी अधिकार; चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 की दी जानकारी

एसकेडी एकेडमी गोमती नगर के बच्चों को पाक्सो कानून के प्रति किया गया जागरूक: विधिक सेवा प्राधिकरण ने समझाया 'गुड टच और बैड टच' का अंतर

📍 स्थान: एसकेडी एकेडमी, गोमती नगर, लखनऊ | 📅 दिनांक: 01 अक्टूबर 2026 | ⚖️ श्रेणी: विधिक साक्षरता, बाल संरक्षण, पाक्सो कानून (POCSO Act) एवं स्कूल शिक्षा

लखनऊ: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), लखनऊ के तत्वावधान में गुरुवार को गोमती नगर स्थित एसकेडी एकेडमी में छात्र-छात्राओं के लिए एक विशेष विधिक साक्षरता एवं जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में बच्चों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम यानी पाक्सो कानून (POCSO Act, 2012), बाल अधिकारों और व्यक्तिगत सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाया गया। इस दौरान विधिक विशेषज्ञों ने सरल भाषा में छात्र-छात्राओं को असहज स्थितियों की पहचान करने और खुलकर शिकायत दर्ज कराने के तौर-तरीके सिखाए।

📌 जागरूकता शिविर के प्रमुख बिंदु:

  • सुलभ विधिक मार्गदर्शन: जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष DLSA के निर्देशन एवं प्राधिकरण के सचिव श्री कुँवर मित्रेश सिंह कुशवाहा की अध्यक्षता में आयोजन।
  • 'गुड टच और बैड टच': बच्चों को शारीरिक स्पर्श की सीमाओं, सुरक्षित व्यवहार और असहज परिस्थितियों में विरोध दर्ज कराने का प्रशिक्षण।
  • पाक्सो एक्ट 2012 के कड़े नियम: बाल शोषण व अपराधों से संबंधित कानूनी धाराओं और उल्लंघन पर होने वाली कठोर सजा से कराया अवगत।
  • इमरजेंसी सपोर्ट नंबर 1098: किसी भी संकट या उत्पीड़न की स्थिति में चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 का उपयोग करने की समझ दी गई।
  • शिक्षकों की जिम्मेदारी: छात्र-छात्राओं में भय और झिझक दूर करने के लिए शिक्षकों से अभिभावक की तरह संवाद स्थापित करने की अपील।

📊 पाक्सो विधिक साक्षरता शिविर: मुख्य विवरण

पहलू / मानक विवरण
आयोजक संस्था जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), लखनऊ
कार्यक्रम स्थल एसकेडी एकेडमी, गोमती नगर शाखा, लखनऊ
अध्यक्षता व मुख्य वक्ता श्री कुँवर मित्रेश सिंह कुशवाहा (सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण)
सहयोगी संस्था व विशेषज्ञ डॉ. नीलम सिंह (वात्सल्य संस्था) एवं पराविधिक स्वयंसेवक (PLVs)
प्रमुख हेल्पलाइन चाइल्ड हेल्पलाइन: 1098

"संकोच छोड़ें, गलत व्यवहार का तुरंत करें विरोध": सचिव कुँवर मित्रेश सिंह कुशवाहा

छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव कुँवर मित्रेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि बचपन को सुरक्षित रखना समाज और कानून दोनों का सर्वोच्च दायित्व है। उन्होंने उदाहरणों के जरिए समझाया कि बच्चों को खुद यह समझना होगा कि कौन सा स्पर्श स्नेहपूर्ण है और कौन सा असहज करने वाला।

"अक्सर बच्चे डर या संकोच के कारण अपने साथ हुई अप्रिय घटनाओं को माता-पिता या शिक्षकों से साझा नहीं कर पाते। कानून आपकी सुरक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा है। यदि कोई भी व्यक्ति आपको असहज महसूस कराता है, तो चुप रहने के बजाय तुरंत अपने परिवार, स्कूल प्रबंधन या चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर सूचित करें। आपकी पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है।"
— कुँवर मित्रेश सिंह कुशवाहा (सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ)

पाक्सो एक्ट 2012: बाल सुरक्षा का सुदृढ़ कानूनी कवच

शिविर के दौरान पाक्सो कानून के प्रमुख वैधानिक प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की गई। विद्यार्थियों को बताया गया कि 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक बालक और बालिका को इस अधिनियम के तहत पूर्ण कानूनी संरक्षण प्राप्त है। कानून में बाल उत्पीड़न के दोषियों के लिए त्वरित सुनवाई (Fast Track Courts) और कठोर कारावास के स्पष्ट प्रावधान हैं।

वात्सल्य संस्था की डॉ. नीलम सिंह ने बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनने और किसी भी दबाव में न आने की प्रेरणा दी। उन्होंने बताया कि कानून केवल सजा देने का जरिया नहीं, बल्कि बच्चों के आत्मसम्मान और अधिकारों को सुरक्षित रखने का माध्यम है।

स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों को संवेदनशीलता बरतने की अपील

प्राधिकरण के सचिव ने एसकेडी एकेडमी के प्रधानाचार्य और समस्त शिक्षक वर्ग से अपील की कि वे स्कूल परिसर में भयमुक्त और विश्वासपूर्ण वातावरण तैयार करें। उन्होंने कहा कि बच्चों के व्यवहार में आने वाले किसी भी अचानक बदलाव या गुमसुम रहने की स्थिति को गंभीरता से देखा जाए और एक संवेदनशील परामर्शदाता (Counselor) की भांति उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए।

कार्यक्रम में विद्यालय के प्रधानाचार्य, शिक्षिकाएं, पराविधिक स्वयंसेवक (PLVs) और बड़ी संख्या में कक्षा स्तर के विद्यार्थी उपस्थित रहे, जिन्होंने उत्साहपूर्वक विधिक प्रश्नों के उत्तर पाए।

निष्कर्ष: एसकेडी एकेडमी में आयोजित यह विधिक जागरूकता शिविर स्कूली बच्चों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति सजग करने और समाज में बच्चों के लिए एक सुरक्षित, संवेदनशील व अपराध-मुक्त परिवेश के निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ।

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