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बैंकों की मनमानी पर रोक, वकीलों को सीधे ब्लैकलिस्ट या कॉशन लिस्ट में नहीं डाल सकते बैंक; सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

Supreme Court Big Decision: बैंक वकीलों को नहीं डाल सकते 'कॉशन लिस्ट' में, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

बड़ा फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी पेशे की आज़ादी को मजबूत करते हुए स्पष्ट किया है कि बैंक और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) वकीलों को सिर्फ पेशेवर लापरवाही के आरोपों के आधार पर कॉशन लिस्ट (सावधानी सूची) या काली सूची (Blacklist) में नहीं डाल सकते।

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने वकीलों के हित में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वकीलों को काली सूची में डालना बार काउंसिल के कानूनी अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र में अनुचित दखल देना है। कोर्ट ने साफ किया कि बैंकों के पास वकीलों के खिलाफ इस तरह की सीधी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें

विषय न्यायालय का आदेश / टिप्पणी
🚫 बैंकों पर रोक बैंक या आईबीए पेशेवर लापरवाही के आरोपों पर वकीलों को सावधानी सूची (Caution List) में नहीं डाल सकते।
⚖️ सही प्रक्रिया वकीलों के खिलाफ शिकायत होने पर बैंकों को सबूतों के साथ संबंधित राज्य 'बार काउंसिल' के सामने जाना होगा।
🏛️ रिट याचिका आईबीए (IBA) के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाएं दायर की जा सकती हैं।

वकीलों के खिलाफ शिकायत हो तो बार काउंसिल से करें संपर्क

पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वकील पर पेशेवर लापरवाही या गलत आचरण के आरोप लगते हैं, और वे आरोप सच भी हों, तो भी वे एडवोकेट्स एक्ट (Advocates Act) के तहत अनुशासनात्मक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में ही आते हैं। अगर किसी बैंक को लगता है कि वकील ने अपनी कानूनी जिम्मेदारियां निभाने में लापरवाही की है, तो सही तरीका यह है कि संबंधित जानकारी और सबूत सक्षम राज्य बार काउंसिल के सामने रखे जाएं।

🎓 नेशनल लीग एकेडमी (National League Academy) की स्थापना के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को एक महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया है:

  • बीसीआई वकीलों के लिए 'नेशनल लीग एकेडमी' स्थापित करने पर विचार-विमर्श करे।
  • इसे विकसित करने के लिए सीनियर और जूनियर वकीलों के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम बनाई जाए।
  • बार काउंसिल इन सभी मुद्दों पर विचार कर अपने फैसले के बारे में कोर्ट को सूचित करेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के नजरिए को किया खारिज:
शीर्ष कोर्ट ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे को और स्पष्ट किया है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पुराने नजरिए को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि आईबीए के खिलाफ रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है क्योंकि वह अनुच्छेद 12 के तहत राज्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अब अनुच्छेद 226 के दायरे में आने वाले 'किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण' वाक्यांश की व्यापक और उदार व्याख्या की जाएगी।

यह फैसला देश भर के वकीलों की सुरक्षा और उनके स्वतंत्र रूप से काम करने के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

(रवींद्र सिंह की रिपोर्ट)

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