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बिजली विभाग की 'वर्टिकल व्यवस्था' फेल, उमस के बीच यूपी में बड़े बिजली संकट की चेतावनी

UP Electricity News: बिजली विभाग की 'वर्टिकल व्यवस्था' पूरी तरह विफल, संघर्ष समिति ने प्रबंधन पर लगाया पॉलिसी पैरालिसिस का आरोप

बिजली विभाग की 'वर्टिकल व्यवस्था' पूरी तरह फेल, प्रबंधन की पॉलिसी पैरालिसिस से उपभोक्ता और कर्मचारी दोनों संकट में

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की चेतावनी— निजीकरण के फेर में टूटी समन्वय की कड़ी, भीषण उमस में बढ़ सकता है बड़ा संकट

📢 VOC | 📍 लखनऊ | 📅 18 जुलाई, 2026
  • विफल मॉडल: निजीकरण की तैयारी के तहत लागू की गई तकनीकी और वाणिज्यिक कार्यों की वर्टिकल व्यवस्था पूरी तरह नाकाम साबित हुई।
  • वर्कलोड में भारी वृद्धि: पहले जो सहायक अभियंता 3-4 उपकेंद्र देखता था, अब उस पर 8 से 10 उपकेंद्रों की जिम्मेदारी डाल दी गई है।
  • गैर-तकनीकी कार्य: उपकेंद्रों और लाइनों के अनुरक्षण (मैंटेनेंस) में लगे तकनीकी स्टाफ को भी जबरन राजस्व वसूली में झोंका जा रहा है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन द्वारा निजीकरण की दिशा में बढ़ाए गए कदमों को बिजली कर्मचारियों ने आड़े हाथों लिया है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के तमाम शहरों में लागू की गई तथाकथित "वर्टिकल व्यवस्था" पूरी तरह विफल हो चुकी है। समिति ने इसे प्रबंधन की "पॉलिसी पैरालिसिस" का जीता-जागता सबूत बताते हुए इस व्यवस्था को तुरंत वापस लेने की मांग की है।

संघर्ष समिति के नेताओं का आरोप है कि बरसों से मजबूती से चल रहे बिजली वितरण ढांचे को निजीकरण के सांचे में ढालने के लिए जबरन यह मॉडल थोपा गया। इस अव्यावहारिक नीति के कारण बड़ी संख्या में नियमित पदों को खत्म कर दिया गया और हजारों संविदा कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसका सीधा असर बिजली सप्लाई की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और जवाबदेही पर पड़ा है।

कृत्रिम विभाजन से टूटा आपसी समन्वय

नई व्यवस्था की खामियों को उजागर करते हुए पदाधिकारियों ने बताया कि इसके तहत 11 केवी और 33 केवी लाइनों तथा सब-स्टेशनों (उपकेंद्रों) के संचालन व मेंटेनेंस के काम को राजस्व वसूली, कमर्शियल और मीटरिंग जैसे कार्यों से पूरी तरह अलग कर दिया गया है। इस बनावटी बंटवारे से विभागों के बीच आपसी तालमेल खत्म हो गया है। जहां पहले एक सहायक अभियंता (AE) तीन से चार सब-स्टेशनों को आसानी से संभाल लेता था, वहीं अब उसे 8 से 10 उपकेंद्रों की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। जूनियर इंजीनियर (JE) और तकनीकी स्टाफ पर भी काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है, जिससे फाल्ट ठीक करने की रफ्तार और गुणवत्ता बेहद खराब हुई है।

⚠️ गंभीर चेतावनी: मानसून की बेरुखी और भीषण उमस के चलते प्रदेश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाली है। स्टाफ की कमी और तकनीकी कर्मचारियों को वसूली में लगाने के कारण फाल्ट जल्दी ठीक नहीं हो पा रहे हैं। अगर यही ढर्रा रहा, तो पूरी बिजली व्यवस्था कभी भी ठप हो सकती है।

राजस्व वसूली पर भी पड़ा उलटा असर

समिति ने साफ किया कि इस अव्यावहारिक विभाजन से न केवल मेंटेनेंस का काम कमजोर हुआ है, बल्कि जिस राजस्व (कमाई) को बढ़ाने के लिए यह तामझाम किया गया था, वह भी उम्मीद के मुताबिक नहीं आ रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कई सब-स्टेशनों पर तकनीकी रूप से दक्ष इंजीनियरों और लाइन स्टाफ को बिजली लाइनों को दुरुस्त रखने के बजाय बिल वसूली जैसे गैर-तकनीकी कामों में लगा दिया गया है। इससे बिजली के सुरक्षित संचालन पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है और आम उपभोक्ताओं को अघोषित बिजली कटौती व लंबे समय तक बिजली गुल रहने की समस्या झेलनी पड़ रही है।

विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की प्रमुख मांगें

बिजली व्यवस्था को बड़े संकट से उबारने के लिए संघर्ष समिति ने प्रबंधन और सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें प्रमुखता से रखी हैं:

इन 4 बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई की मांग:

  • पुरानी व्यवस्था की बहाली: विफल साबित हो चुकी वर्टिकल व्यवस्था को तत्काल समाप्त कर पहले जैसी एकीकृत और समन्वित प्रणाली लागू की जाए।
  • नियमित भर्तियां: विभाग में रिक्त चल रहे सभी पदों पर बिना देरी किए तत्काल नियमित सीधी भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • संविदा कर्मियों की वापसी: नौकरी से बेदखल किए गए सभी संविदा कर्मचारियों को तुरंत काम पर वापस लिया जाए।
  • उत्पीड़न पर रोक: बिजली कर्मियों के खिलाफ की गई सभी दंडात्मक और उत्पीड़नात्मक कार्रवाइयों को बिना शर्त तुरंत वापस लिया जाए।

पदाधिकारियों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि प्रदेश की जनता को 24 घंटे निर्बाध, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण बिजली देने का यही एकमात्र रास्ता है। यदि प्रबंधन ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी और इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त नहीं किया, तो आने वाले दिनों में करोड़ों उपभोक्ताओं को होने वाली असुविधा की पूरी जिम्मेदारी पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन की होगी।

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