भदोही को फिर मिलेगी संत रविदास के नाम से पहचान: योगी कैबिनेट ने 'संत रविदासनगर भदोही' नाम पर लगाई मुहर; दलित और राजभर समाज दोनों की विरासत को सम्मान
लखनऊ: कालीन नगरी के रूप में विश्व विख्यात भदोही जिले को एक बार फिर संत शिरोमणि गुरु रविदास के नाम से नई पहचान मिलने जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में शुक्रवार को संपन्न हुई राज्य मंत्रिपरिषद (कैबिनेट) की बैठक में जिले का आधिकारिक नाम बदलकर 'संत रविदासनगर भदोही' करने के प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी दे दी गई। पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान जिले के नाम से 'संत रविदास' हटाकर केवल भदोही कर दिया गया था। अब योगी सरकार ने महान संत के सम्मान को पुनर्स्थापित करने के साथ-साथ भदोही की ऐतिहासिक भार राज पहचान को भी बरकरार रखने का संतुलित निर्णय लिया है।
📌 नामकरण फैसले के प्रमुख बिंदु:
- नया आधिकारिक नाम: जिले का नाम अब 'संत रविदासनगर भदोही' दर्ज किया जाएगा।
- सपा सरकार का फैसला पलटा: वर्ष 2014 में अखिलेश यादव सरकार ने संत रविदास का नाम हटाकर केवल 'भदोही' किया था।
- सामाजिक संतुलन का संदेश: दलित समाज की आस्था के प्रतीक संत रविदास और राजभर समाज की भार राज विरासत—दोनों को एक साथ साधा गया।
- कानूनी आधार: उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की संशोधित धारा 6(2) और गृह मंत्रालय के 1953 के दिशा-निर्देशों के अनुरूप निर्णय।
📊 भदोही नामकरण का राजनीतिक व प्रशासनिक कालक्रम
| वर्ष / कालखंड | शासकीय निर्णय | तत्कालीन सरकार एवं संदर्भ |
|---|---|---|
| वर्ष 1997 | संत रविदास नगर | मायावती सरकार द्वारा जिले का गठन व नामकरण |
| वर्ष 2014 | केवल 'भदोही' | अखिलेश यादव (सपा) सरकार द्वारा संत रविदास नाम हटाया गया |
| अक्टूबर 2026 | संत रविदासनगर भदोही | योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा संयुक्त नामकरण पर मुहर |
संत परंपरा और सामाजिक सुधार को समर्पित निर्णय
मंत्रिपरिषद की बैठक के उपरांत वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने पत्रकारों को इस ऐतिहासिक निर्णय की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संत रविदास ने मध्यकालीन भारत में सामाजिक समरसता, आडंबरहीन भक्ति और मानवता के उत्थान के लिए जो अलख जगाई थी, वह देश की अमूल्य धरोहर है।
“भारतीय संत परंपरा और समाज सुधार में संत रविदास जी का योगदान अद्वितीय है। नए नाम में संत रविदास जी के प्रति सर्वोच्च सम्मान भी जुड़ा है और कालीन उद्योग के वैश्विक केंद्र 'भदोही' की ऐतिहासिक पहचान भी अक्षुण्ण रखी गई है।”
— सुरेश खन्ना (वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री, उत्तर प्रदेश)
दलित और राजभर समाज: दोहरा सामाजिक संतुलन
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, योगी सरकार के इस कदम के गहरे सामाजिक और चुनावी मायने हैं:
- दलित समाज का सम्मान: संत रविदास दलित समाज की धार्मिक चेतना और आत्मगौरव के सबसे बड़े केंद्र हैं। उनके नाम को दोबारा जोड़कर सरकार ने सपा पर दलित विरोधी होने का नैरेटिव सेट किया है।
- राजभर (भार) समाज की ऐतिहासिकता: भदोही का ऐतिहासिक नाम प्राचीन 'भार राज' (भर शासकों) की रियासत से जुड़ा माना जाता है, जिसे पूर्वांचल का राजभर समाज अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत मानता है।
- संतुलित दृष्टिकोण: केवल संत रविदास नगर करने से स्थानीय भदोही की पहचान छूटती थी और केवल भदोही रखने से संत परंपरा का अपमान झलकता था। 'संत रविदासनगर भदोही' नाम रखकर सरकार ने दोनों समुदायों के स्वाभिमान को सहेज लिया है।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के तहत कानूनी प्रक्रिया
प्रदेश शासन ने स्पष्ट किया है कि नाम परिवर्तन की यह वैधानिक प्रक्रिया उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की संशोधित धारा 6(2) के तहत संपन्न की गई है। इस धारा के अंतर्गत राज्य सरकार को किसी भी जिले, तहसील या राजस्व क्षेत्र के नामकरण और सीमाओं में संशोधन का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, गृह मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा 11 सितंबर 1953 को जारी दिशा-निर्देशों और परिपत्रों के सभी मानकों का भी इस प्रस्ताव में पूर्ण पालन किया गया है।

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