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नवरात्रि का सातवां दिन: मां कालरात्रि की पूजा से दूर होगा हर भय; जानिए स्वरूप, गुड़ का प्रिय भोग, मंत्र और पौराणिक कथा

नवरात्रि का सातवां दिन आज: मां कालरात्रि की पूजा, जानिए दिव्य स्वरूप, गुड़ का प्रिय भोग, पौराणिक कथा, सिद्ध मंत्र और महिमा

🕉️ पर्व संदर्भ: शारदीय नवरात्र (सप्तमी तिथि) | 📅 दिनांक: 17 अक्टूबर 2026 | 🚩 श्रेणी: नवदुर्गा साधना, सनातन धर्म, पूजा विधि, आध्यात्मिक मार्गदर्शन
मां कालरात्रि की तस्वीर, नवदुर्गा का सातवां स्वरूप
नवरात्रि के सातवें दिन पूजित मां दुर्गा का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि।

लखनऊ: शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। मां कालरात्रि को काल और दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली तथा अपने भक्तों को समस्त सांसारिक भयों से मुक्त करने वाली देवी माना जाता है। देवी का स्वरूप देखने में भले ही अत्यंत उग्र और भयानक प्रतीत होता है, परंतु वे अपने साधकों के लिए सदैव कल्याणकारी और वरदायिनी हैं, इसी कारण शास्त्रों में इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि की सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की साधना करने से नकारात्मक ऊर्जा, ग्रह-बाधाएं और जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं।

📌 मां कालरात्रि पूजन के मुख्य बिंदु:

  • शुभंकरी स्वरूप: उग्र स्वरूप के बावजूद अपने भक्तों को सदैव शुभ फल, सुरक्षा और अभय प्रदान करती हैं।
  • दुष्टों का संहार: दैत्यों और आसुरी प्रवृत्तियों का नाश कर धर्म व सत्य की रक्षा करने वाली काल की संहारक शक्ति।
  • प्रिय नैवेद्य (गुड़ का भोग): मां कालरात्रि को गुड़ (Jaggery) अथवा गुड़ से बने सात्विक मिष्ठान्न अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • आध्यात्मिक चक्र (सहस्रार चक्र): योग साधना में सप्तमी तिथि पर साधक का मन मस्तिष्क के सर्वोच्च सहस्रार चक्र में केंद्रित होता है।
  • भय व संकट से मुक्ति: मां की कृपा से अकाल मृत्यु का भय, नकारात्मक शक्तियां और अज्ञात चिंताएं पूरी तरह समाप्त होती हैं।

📊 मां कालरात्रि: आध्यात्मिक स्वरूप एवं पूजा विधान

आयाम / विवरण शास्त्रीय एवं व्यावहारिक मान्यता
नवदुर्गा क्रम सप्तम स्वरूप (सातवां दिन / सप्तमी तिथि)
वर्ण एवं आभा अंधकार के समान सघन कृष्ण (श्याम) वर्ण; विद्युत सदृश देदीप्यमान कंठमाला
नेत्र एवं वाहन त्रिनेत्र (तीन आंखें जिनसे तेज निकलता है); वाहन गर्दभ (गधा)
हस्त एवं आयुध चतुर्भुज रूप: दाहिने हाथ अभय व वरद मुद्रा में, बाएं हाथों में कटार/खड़्ग व लोहे का कांटा (वज्र)
विशिष्ट प्रिय भोग शुद्ध गुड़ (Jaggery), गुड़ की खीर एवं सात्विक मिष्ठान्न
प्रिय पुष्प एवं रंग लाल गुड़हल या नीले अपराजिता के पुष्प; नीला व गहरा जामुनी रंग
साधना चक्र प्रभाव सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra — मोक्ष, आत्मज्ञान व ब्रह्मांडीय चेतना)

दिव्य स्वरूप: अंधकार का नाश और असीम तेज का संचार

मां कालरात्रि का स्वरूप ब्रह्मांडीय रहस्यों को समेटे हुए है। उनका रंग गहन अंधकार की भांति काला है और बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की चमक जैसी आभा बिखेरने वाली माला शोभित है। उनके तीनों गोल नेत्रों से अग्नि की किरणें निकलती हैं और नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएं प्रकट होती हैं।

उनका वाहन गधा है। चतुर्भुज देवी के ऊपरी दाहिने हाथ से अभय मुद्रा और निचले दाहिने हाथ से वरद मुद्रा में भक्तों को सुरक्षा व आशीर्वाद मिलता है। वहीं, बाएं हाथों में लोहे का कांटा और खड्ग है। उनका यह विकराल रूप बुराई, अन्याय और नकारात्मक शक्तियों के लिए विनाशकारी है, जबकि भक्तों के लिए परम स्नेहमयी मां का आवरण है।

“शास्त्रों में कहा गया है कि मां कालरात्रि के नाम स्मरण मात्र से भूत, पिशाच, भय और नकारात्मक प्रवृत्तियां भाग खड़ी होती हैं। देवी का संदेश है कि बाहर का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य और आत्मबल की एक चिंगारी उसे नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।”

पौराणिक कथा: जब धर्म की रक्षा के लिए प्रकट हुआ कालरात्रि स्वरूप

दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे पराक्रमी असुरों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवती ने उग्र रूप धारण किया। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके रक्त की एक बूंद भी यदि धरती पर गिरेगी तो उससे लाखों नए रक्तबीज उत्पन्न हो जाएंगे।

समस्त सेना जब असहाय हो गई, तब मां दुर्गा के तेज से मां कालरात्रि का प्राकट्य हुआ। देवी ने अपने खड्ग से रक्तबीज का सिर काट दिया और उसके रक्त को धरती पर गिरने से पहले ही अपने खप्पर में समाहित कर लिया। इस प्रकार इस भीषण असुर का अंत हुआ और समस्त सृष्टि को जीवनदान मिला।

मां कालरात्रि की पूजा विधि: सप्तमी तिथि पर अपनाएं यह क्रम

  1. प्रातः स्नान व शुद्धि: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और स्वच्छ, गहरे या लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
  2. आसन व चौकी स्थापना: पूजा वेदी को गंगाजल से पवित्र कर मां कालरात्रि की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।
  3. दीप प्रज्वलन: मां के समक्ष शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-लोबान जलाएं।
  4. पुष्प व कुमकुम अर्पण: देवी को रोली, अक्षत, सिंदूर और विशेष रूप से लाल गुड़हल अथवा नीले अपराजिता के पुष्प अर्पित करें।
  5. गुड़ का प्रिय भोग: मां कालरात्रि को शुद्ध गुड़ या गुड़ से निर्मित नैवेद्य श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
  6. मंत्र जाप व पाठ: एकाग्रचित्त होकर मां के बीज मंत्र या ध्यान श्लोक का कम से कम 108 बार जाप करें। साथ ही दुर्गा चालीसा का पाठ करें।
  7. आरती व प्रसाद वितरण: अंत में कर्पूर जलाकर आरती करें और पूजा में अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगते हुए प्रसाद वितरित करें।

मां कालरात्रि के सिद्ध मंत्र

🔹 ध्यान एवं स्तुति श्लोक:

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥


🔹 सरल बीज एवं उपासना मंत्र:

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः॥


🔹 भय व संकट निवारण प्रार्थना:

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

निष्कर्ष: नवरात्रि की सप्तमी तिथि पर मां कालरात्रि की उपासना साधक को असीम मानसिक बल, निर्भीकता और आत्मिक शांति प्रदान करती है। उनका उग्र स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि बुराई कितनी भी विशाल क्यों न हो, धर्मनिष्ठ संकल्प के सामने उसे पराजित होना ही पड़ता है। गुड़ के भोग और भक्तिभाव से मां का आह्वान कर जीवन की समस्त बाधाओं को दूर किया जा सकता है।

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