नवरात्रि का पांचवां दिन: मां स्कंदमाता को प्रिय है केला और पीले रंग के पुष्प; जानिए संपूर्ण पूजा विधि, प्रिय भोग, मंत्र और आध्यात्मिक संदेश
लखनऊ: शारदीय नवरात्रि के पावन महोत्सव के पांचवें दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें 'स्कंदमाता' के नाम से जाना जाता है। वात्सल्य, करुणा और ममता की अधिष्ठात्री यह देवी अपनी गोद में बाल रूप स्कंद को लिए कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। मान्यता है कि पंचमी तिथि पर पीले पुष्प और केले का भोग अर्पित कर मां की साधना करने से भक्तों को संतान सुख, आरोग्य, परम शांति और सांसारिक बंधनों से मुक्ति की प्राप्ति होती है।
📌 मां स्कंदमाता साधना के मुख्य बिंदु:
- स्कंद की जननी: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के नाते इनकी पूजा से माता और बाल कार्तिकेय दोनों का आशीर्वाद एक साथ मिलता है।
- प्रिय नैवेद्य (भोग): देवी स्कंदमाता को पका हुआ केला और केसर युक्त सात्विक मिष्ठान्न अत्यंत प्रिय हैं।
- प्रिय पुष्प व रंग: मां को पीले रंग के पुष्प (जैसे गेंदा, पीला कनेर) और पीले वस्त्र अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है।
- पद्मासना देवी: सिंह पर सवार होने के साथ ही कमल पुष्प पर आसन ग्रहण करने के कारण इन्हें 'पद्मासना देवी' भी कहा जाता है।
- चक्र साधना: कुंडलिनी एवं योग साधना में इस दिन साधक का चित्त विशुद्ध चक्र (कंठ चक्र) में स्थिर होता है।
📊 मां स्कंदमाता: शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक स्वरूप
| आयाम / विवरण | शास्त्रीय व पौराणिक मान्यता |
|---|---|
| नवदुर्गा क्रम | पंचम स्वरूप (पांचवां दिन / पंचमी तिथि) |
| वाहन एवं आसन | सिंह की सवारी एवं कमल के पुष्प पर पद्मासन मुद्रा |
| हस्त मुद्रा व आयुध | चतुर्भुज रूप: दो हाथों में कमल, एक हाथ से बाल स्कंद को गोद में लिए हुए, चौथा हाथ वरमुद्रा में |
| विशिष्ट प्रिय भोग | पके केले का नैवेद्य, खीर, मेवे और सात्विक मिष्ठान्न |
| साधना चक्र प्रभाव | विशुद्ध चक्र (Vishuddha Chakra — वाणी, विचार शुद्धि व सम्मोहन शक्ति) |
वात्सल्य की देवी: जब मां ने थामा बाल स्कंद का हाथ
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब तारकासुर नामक दैत्य के अत्याचारों से त्रिलोकी में त्राहि-त्राहि मच गई थी, तब भगवान शिव और माता पार्वती के तेज से छह मुख वाले भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का प्राकट्य हुआ। देवी पार्वती ने माता के रूप में अपने पुत्र स्कंद को युद्ध कला और अस्त्र-शस्त्रों की दीक्षा दी, जिसके बल पर उन्होंने तारकासुर का संहार किया।
“शास्त्रों में उल्लेख है कि मां स्कंदमाता की उपासना करने वाले भक्त को अलग से भगवान कार्तिकेय की पूजा करने की आवश्यकता नहीं होती। मां की गोद में विराजमान होने के कारण बाल रूप स्कंद का आशीर्वाद साधक को स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। यह स्वरूप बताता है कि एक सशक्त मां ही अपने बालक को समाज व धर्म की रक्षा के योग्य बनाती है।”
पूजा विधि: पंचमी तिथि पर कैसे करें मां की आराधना?
नवरात्रि के पांचवें दिन प्रातःकाल शुद्धि और भक्ति भाव के साथ पूजन संपन्न करना चाहिए:
- स्नान एवं वस्त्र चयन: नित्यकर्म से निवृत्त होकर पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें। पीला रंग बृहस्पति और तेजस्विता का प्रतीक माना जाता है।
- वेदी एवं कलश वंदन: पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित कर सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश और कलश देवता का ध्यान करें।
- पुष्प व चंदन अर्पण: मां स्कंदमाता को पीले चंदन का तिलक लगाएं और पीले गेंदे या पीले कनेर के ताजे फूल अर्पित करें।
- केले का भोग: मां को ताजे केले का भोग लगाएं। केले के अतिरिक्त मौसमी फल और शुद्ध घी से बनी खीर का नैवेद्य भी अत्यंत कल्याणकारी होता है।
- मंत्र जप व आरती: धूप-दीप दिखाकर माता के स्तुति मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें और अंत में कपूर जलाकर आरती गाएं।
मां स्कंदमाता के सिद्ध ध्यान एवं स्तुति मंत्र
🔹 शास्त्रीय ध्यान श्लोक:
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
🔹 सरल बीज एवं उपासना मंत्र:
ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
ममता, करुणा और दायित्व बोध का प्रेरणादायी संदेश
मां स्कंदमाता का स्वरूप केवल एक देवीय रूप नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का दर्शन है:
- ममता और साहस का संतुलन: मां एक हाथ से अपने बालक को सुरक्षा का संबल देती हैं और दूसरे हाथ से सिंह की सवारी कर अधर्म के विरुद्ध साहस का संचार करती हैं।
- पारिवारिक कल्याण: जो साधक पूरी निष्ठा से पंचमी के दिन देवी का ध्यान करते हैं, उनके पारिवारिक कलह दूर होते हैं और घर में सुख, शांति व सौहार्द का वातावरण निर्मित होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा: मां की कृपा से जीवन की कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए धैर्य, आत्मविश्वास और नैतिक जिम्मेदारी की भावना सुदृढ़ होती है।



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