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पीकिंग विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी विवि वर्धा के डॉ. अनिर्बाण घोष ने प्रस्तुत किया शोध पत्र; कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने दी बधाई

पीकिंग विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी विश्वविद्यालय के डॉ. अनिर्बाण घोष ने प्रस्तुत किया शोध पत्र; वैश्विक मंच पर गूंजा भारतीय भाषाओं का विमर्श

📍 स्थान: वर्धा (महाराष्ट्र) / बीजिंग (चीन) | 📅 दिनांक: 08 अक्टूबर 2026 | 🎓 श्रेणी: उच्च शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, प्राच्य विद्या शोध एवं अकादमिक जगत

वर्धा: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा) के भाषा विद्यापीठ अंतर्गत अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा अध्ययन विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अनिर्बाण घोष ने चीन के विश्वविख्यात पीकिंग विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सहभागिता कर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। पीकिंग विश्वविद्यालय के पूर्वी साहित्य अनुसंधान केंद्र तथा विदेशी भाषा विद्यापीठ के प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना के 80 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस प्रतिष्ठित दो दिवसीय संगोष्ठी में डॉ. घोष की उपस्थिति को भारतीय उच्च शिक्षा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण अकादमिक उपलब्धि माना जा रहा है।

📌 संगोष्ठी एवं शोध पत्र के मुख्य बिंदु:

  • शोध पत्र का विषय: “चीन में भारतीय भाषाओं का अध्ययन : पीकिंग विश्वविद्यालय के प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना में चीनी और भारतीय विद्वानों का योगदान”।
  • वैश्विक भागीदारी: भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, फिलीपींस और वियतनाम सहित दुनिया भर के शीर्ष विश्वविद्यालयों के करीब 70 विषय-विशेषज्ञ शामिल।
  • 100 वर्ष पुरानी परंपरा: चीन में भारत अध्ययन (इकोलॉजी एवं प्राच्य विद्या) की लगभग एक शताब्दी पुरानी अकादमिक परंपरा और उसके समकालीन महत्व पर गहन मंथन।
  • कुलपति द्वारा सराहना: MGAHV वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने डॉ. घोष की इस उपलब्धि को विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला बताया।

📊 अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी: एक नजर में

विवरण घटक तथ्य व जानकारी
शोधकर्ता / प्रतिनिधि डॉ. अनिर्बाण घोष (सहायक आचार्य, MGAHV वर्धा)
आयोजक संस्थान पीकिंग विश्वविद्यालय (Peking University, China)
शोध पत्र का शीर्षक चीन में भारतीय भाषाओं का अध्ययन : पीकिंग विश्वविद्यालय के प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना में चीनी और भारतीय विद्वानों का योगदान
ऐतिहासिक अवसर प्राच्य अध्ययन विभाग की स्थापना के 80 वर्ष पूर्ण होने का समारोह
सहभागी संस्थान ऑक्सफोर्ड, एडिनबर्ग, NYU, जेएनयू, बॉन, सियोल सहित 20+ चीनी विवि

चीन में भारतीय भाषाओं के अध्ययन की शताब्दी पुरानी विरासत

डॉ. अनिर्बाण घोष ने अपने शोध पत्र में इस ऐतिहासिक तथ्य को प्रमुखता से रेखांकित किया कि चीन में भारत अध्ययन की औपचारिक शुरुआत लगभग 100 वर्ष पूर्व पीकिंग विश्वविद्यालय से हुई थी। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भारतीय और चीनी विद्वानों के संयुक्त बौद्धिक प्रयासों से पीकिंग विश्वविद्यालय के प्राच्य अध्ययन विभाग की नींव पड़ी, जिसने दोनों सभ्यताओं के मध्य भाषा, साहित्य और दार्शनिक सेतु का निर्माण किया।

"एशिया और विश्व में प्राच्य विद्या का इतिहास दोनों प्राचीन सभ्यताओं के ज्ञान-साझेदारी का प्रमाण है। भारतीय भाषाओं के अध्ययन ने चीनी अकादमिक जगत में भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक समझ को समृद्ध करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।"

वैश्विक विश्वविद्यालयों का जमावड़ा

इस संगोष्ठी में भारत से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रतिनिधियों के अतिरिक्त विश्वस्तरीय संस्थानों की उपस्थिति रही:

  • यूरोप व अमेरिका: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, एडिनबर्ग विश्वविद्यालय (ब्रिटेन), न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय (अमेरिका) एवं बॉन विश्वविद्यालय (जर्मनी)।
  • एशियाई देश: मनीला विश्वविद्यालय (फिलीपींस), सियोल विश्वविद्यालय (दक्षिण कोरिया), मंगोलिया राष्ट्रीय विश्वविद्यालय तथा चियांग माई विश्वविद्यालय (वियतनाम)।
  • चीन के प्रमुख संस्थान: पीकिंग विवि के अतिरिक्त चिंगहुआ, रेनमिन, बीजिंग फॉरेन स्टडीज, शंघाई, चोंगकिंग, निंगश्या और वुहान विश्वविद्यालय के 70 से अधिक शोधकर्ता।

कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने दी बधाई

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने डॉ. घोष की इस अंतरराष्ट्रीय सहभागिता पर उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों का ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोध प्रस्तुत करना हिंदी विश्वविद्यालय की वैश्विक अकादमिक पहचान को सुदृढ़ करता है और भारतीय भाषा अध्ययन के क्षितिज का विस्तार करता है।

अकादमिक महत्व: यह संगोष्ठी भारत-चीन के ऐतिहासिक व भाषाई संबंधों को समकालीन संदर्भ में समझने और प्राच्य अध्ययन में नई शोध संभावनाओं को तलाशने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हुई है।

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