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दवा खरीद और मरीज से वसूली में 67 गुना तक का अंतर: यूपी एफएसडीए ने NPPA को लिखा पत्र; ट्रेड मार्जिन कैपिंग व कड़े नियमों की मांग

दवाओं की खरीद और मरीज से वसूली में 67 गुना तक अंतर: यूपीएफएसडीए ने एनपीपीए से मांगा हिसाब; ट्रेड मार्जिन कैपिंग और मूल्य नियंत्रण की उठी मांग

📍 स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश | 📅 दिनांक: 06 अक्टूबर 2026 | 💊 श्रेणी: औषधि मूल्य निर्धारण, उपभोक्ता अधिकार, यूपी एफएसडीए, एनपीपीए एवं स्वास्थ्य सुधार

लखनऊ: अस्पतालों में जीवनरक्षक दवाओं, मेडिकल डिवाइसेज और न्यूट्रास्यूटिकल्स की खरीद लागत तथा मरीजों से वसूले जाने वाले बिल के बीच भारी अंतर को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र स्तर पर बड़ी पहल की है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (UPFSDA) की आयुक्त एवं सचिव डॉ. रोशन जैकब ने राष्ट्रीय स्तर के दवा मूल्य नियामक नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को पत्र लिखकर प्रभावी विधिक कार्रवाई का अनुरोध किया है। प्रदेश के 52 प्रमुख मेडिकल कॉलेजों व अस्पतालों की 200 से अधिक फार्मेसियों के निरीक्षण में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि अस्पतालों की खरीद कीमत (PTR) और मरीज से लिए जाने वाले मूल्य (PTC) में कई मामलों में 67 गुना तक का भारी अंतर मौजूद है।

📌 यूपीएफएसडीए द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदु:

  • 67 गुना तक का अंतर: 22 मेडिकल कॉलेजों और 30 प्रमुख अस्पतालों की 200+ फार्मेसियों की जांच में खरीद और बिक्री दरों में भारी मुनाफाखोरी उजागर।
  • कागजी छूट का खेल: अत्यधिक एमआरपी (MRP) तय कर उस पर भारी डिस्काउंट का दिखावा किया जाता है, लेकिन थोक खरीद की वास्तविक बचत मरीज तक नहीं पहुंचती।
  • एक ब्रांड, दो एमआरपी: एक ही निर्माता और एक ही ब्रांड की दवाओं की संस्थागत अस्पताल आपूर्ति में अलग-अलग एमआरपी अंकित होने का भी पर्दाफाश।
  • कॉस्ट प्लस मॉडल का सुझाव: यूपी के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कैंसर व एंटीबायोटिक्स दवाओं के लिए अपनाए जा रहे 'कॉस्ट प्लस' मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने पर बल।
  • चार-सूत्रीय राष्ट्रीय कार्ययोजना: हाई-एमआरपी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन कैपिंग, एमआरपी का तार्किक निर्धारण, डीपीसीओ शेड्यूल विस्तार व कड़े दंडात्मक नियम लागू करने की मांग।

📊 जांच रिपोर्ट एवं अंतर का तुलनात्मक विश्लेषण

जांच का दायरा सामने आए प्रमुख तथ्य
निरीक्षित संस्थान 22 मेडिकल कॉलेज और 30 सरकारी व निजी अस्पताल (कुल 200+ फार्मेसियां)
अधिकतम मूल्य विसंगति पीटीआर (PTR) और मरीज वसूली में 67 गुना तक का भारी अंतर
प्रभावित श्रेणियां दवाएं, कंज्यूमेबल्स, सर्जिकल उपकरण, मेडिकल डिवाइस एवं न्यूट्रास्यूटिकल्स
बाजार विसंगति अस्पतालों के लिए विशेष कॉन्ट्रैक्ट ब्रांड्स, जो खुले रिटेल बाजार में उपलब्ध नहीं होते

सस्ती खरीद का लाभ मरीज तक क्यों नहीं? एमआरपी पर छूट का भ्रम

आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने पत्र में उल्लेख किया है कि निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर संस्थागत खरीद के तहत बड़े अस्पतालों को अत्यधिक रियायती दरों पर उत्पाद मुहैया कराते हैं। परंतु दवाओं के पैकेट पर अत्यधिक ऊंची एमआरपी (MRP) मुद्रित होती है।

अस्पताल प्रशासन मरीजों को एमआरपी पर 10% से 20% तक की छूट देने का दावा करता है, जिससे कागजों पर मरीज को राहत महसूस होती है। लेकिन असल में अस्पताल ने वह दवा एमआरपी से 70% से 90% तक कम कीमत पर खरीदी होती है। इस प्रकार वास्तविक थोक खरीद का वित्तीय लाभ मरीज की जेब तक पहुंचने के बजाय मध्यवर्ती मुनाफे में बदल जाता है।

"अस्पतालों में भर्ती मरीज के पास बाहर से दवा लेने का कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं होता। ऐसी स्थिति में अत्यधिक एमआरपी अंकित कर भारी मुनाफा कमाना मरीज के अधिकारों के साथ सीधा अन्याय है। इस असमानता को केवल राष्ट्रीय स्तर पर नियामकीय हस्तक्षेप और ट्रेड मार्जिन कैपिंग से ही रोका जा सकता है।"
— डॉ. रोशन जैकब (आयुक्त एवं सचिव, यूपी एफएसडीए)

एक ही ब्रांड की अलग-अलग एमआरपी और 'कैप्टिव सप्लाई' की समस्या

एनपीपीए को भेजे गए पत्र में अस्पतालों की एकाधिकारवादी प्रथाओं पर भी गंभीर चिंता जताई गई है:

  • दोहरी एमआरपी प्रणाली: जांच में पाया गया कि कई निर्माताओं द्वारा एक ही दवा और एक ही ब्रांड नेम के बावजूद सामान्य बाजार आपूर्ति और अस्पताल आपूर्ति के लिए अलग-अलग एमआरपी मुद्रित की जा रही थी।
  • एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग: दवा कंपनियों से ऐसे विशिष्ट ब्रांड्स तैयार कराए जा रहे हैं जो सामान्य रिटेल बाजार में नहीं मिलते। इससे तीमारदार खुले बाजार से दवा की कीमतों की तुलना नहीं कर पाता और पूरी तरह अस्पताल फार्मेसी पर निर्भर हो जाता है।

यूपीएफएसडीए का एनपीपीए को 4-स्तरीय एक्शन प्लान

विभाग ने नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी से राष्ट्रीय स्तर पर इन चार बिंदुओं पर त्वरित निर्णय लेने का आग्रह किया है:

  1. ट्रेड मार्जिन कैपिंग (Trade Margin Capping): अत्यधिक एमआरपी वाली दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में अधिकतम व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय की जाए।
  2. एमआरपी निर्धारण का युक्तियुक्तकरण: दवा निर्माण की वास्तविक लागत और अनुमति योग्य पोस्ट-मैन्युफैक्चरिंग खर्च के आधार पर ही एमआरपी तय करने का राष्ट्रीय फॉर्मूला बने।
  3. डीपीसीओ-2013 के मूल्य नियंत्रण का विस्तार: अत्यधिक मार्जिन वाली अस्पताल आपूर्ति की सभी जीवनरक्षक दवाओं को ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के मूल्य-नियंत्रित शेड्यूल में शामिल किया जाए।
  4. उल्लंघन पर सख्त कानूनी कार्रवाई: डीपीसीओ प्रावधानों के उल्लंघन को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (Drugs & Cosmetics Act) के दंडात्मक दायरे में लाया जाए, जिससे राज्य के औषधि निरीक्षकों को विधिक अभियोजन का ठोस आधार मिल सके।

यूपी के 'कॉस्ट प्लस' मॉडल और मूल्य प्रकटीकरण का हवाला

पत्र में अवगत कराया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने राज्य मेडिकल कॉलेजों में गंभीर कैंसर दवाओं और हाई-एंड एंटीबायोटिक्स के लिए ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल लागू किया है, जहां मुद्रित एमआरपी के स्थान पर वास्तविक खरीद मूल्य में न्यूनतम प्रशासनिक लागत जोड़कर दवा मरीजों को दी जाती है।

इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा 1 अक्टूबर के आदेश के तहत अस्पताल फार्मेसियों के लिए वेबसाइट पर खरीद मूल्य (PTR) और बिक्री दर (PTC) का स्व-प्रकटीकरण अनिवार्य किया गया है, ताकि जनता के समक्ष वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।

निष्कर्ष: यदि एनपीपीए इन सिफारिशों को स्वीकार कर ट्रेड मार्जिन कैपिंग लागू करता है, तो देश भर के करोड़ों मरीजों को अत्यधिक महंगे चिकित्सा बिलों और अप्रत्याशित दवा खर्च से ऐतिहासिक राहत मिलेगी।

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