‘वैश्विक गांधी: भारतवंशी चित्त के शिल्पी’ पुस्तक का हुआ भव्य लोकार्पण: वर्धा अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और सेवाग्राम आश्रम में विमोचन; 17 देशों में बापू की वैश्विक विरासत का संकलन
वर्धा: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के पावन अवसर पर प्रवासी भारतीय समाज और वैश्विक चेतना पर बापू के विचारों के प्रभाव को रेखांकित करती महत्वपूर्ण कृति ‘वैश्विक गांधी: भारतवंशी चित्त के शिल्पी’ का लोकार्पण संपन्न हुआ। इस पुस्तक का विमोचन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (MGAHU), वर्धा तथा ऐतिहासिक सेवाग्राम आश्रम में दो अलग-अलग गरिमामयी आयोजनों में किया गया। ‘नयी किताब’ से प्रकाशित इस संकलन में दुनिया भर के 17 से अधिक देशों में गांधी जी के प्रभाव, दर्शन और प्रवासी साहित्य में उनकी प्रासंगिकता पर आधारित 27 शोधपरक आलेख शामिल हैं।
📌 पुस्तक एवं लोकार्पण के मुख्य बिंदु:
- दोहरा विमोचन: विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा व अतिथियों द्वारा तथा सेवाग्राम आश्रम में अध्यक्ष श्रीमती आशा बोथरा द्वारा विमोचन।
- संपादक मंडल: श्री चमनलाल प्रवासन एवं डायस्पोरा अध्ययन विभाग के डॉ. मुन्नालाल गुप्ता और डॉ. राजीव रंजन राय (संपादक) तथा डॉ. अर्चना बलवीर (सह-संपादक)।
- वैश्विक फलक: मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद, अमेरिका, इंग्लैंड, जापान और दक्षिण अफ्रीका समेत 17 देशों के प्रवासी विमर्श का समावेश।
- 27 महत्वपूर्ण आलेख: गांधी जी के जीवन में 'कस्तूरबा' की भूमिका, प्रवासी हिंदी साहित्य, जर्मन साहित्य और व्यक्तित्व निर्माण में प्रवास की भूमिका पर विशेष अध्याय।
- प्रकाशक: 'नयी किताब' प्रकाशन द्वारा पुस्तक का सुरुचिपूर्ण मुद्रण किया गया है।
📊 ‘वैश्विक गांधी: भारतवंशी चित्त के शिल्पी’ — एक नजर में
| प्रमुख विवरण | तथ्य व जानकारी |
|---|---|
| पुस्तक का नाम | वैश्विक गांधी: भारतवंशी चित्त के शिल्पी |
| संपादक | डॉ. मुन्नालाल गुप्ता एवं डॉ. राजीव रंजन राय |
| सह-संपादक | डॉ. अर्चना बलवीर |
| संबंधित विभाग | श्री चमनलाल प्रवासन एवं डायस्पोरा अध्ययन विभाग (MGAHU) |
| कुल आलेख व विषय-विस्तार | 27 आलेख (17 देशों में गांधी प्रभाव और वैचारिक विमर्श) |
विश्वविद्यालय और बापू की कर्मभूमि सेवाग्राम में हुआ विमोचन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में 2 अक्टूबर को आयोजित केंद्रीय समारोह में कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा, मध्य प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव मनोज कुमार श्रीवास्तव, गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार राय तथा कुलानुशासक डॉ. राकेश कुमार मिश्र ने संयुक्त रूप से पुस्तक का लोकार्पण किया।
वहीं, बापू की ऐतिहासिक तपोस्थली सेवाग्राम आश्रम में आयोजित विशेष कार्यक्रम में सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान की अध्यक्ष श्रीमती आशा बोथरा, जाने-माने गांधीवादी चिंतक दर्शन शंकर और आश्रम प्रतिष्ठान के मंत्री विजय ताम्बे द्वारा पुस्तक का विमोचन किया गया। वक्ताओं ने कहा कि यह पुस्तक भारतवंशियों के मानस में गांधी जी की चेतना को समझने का एक प्रामाणिक दस्तावेज है।
17 देशों में बापू का प्रभाव: गिरमिटिया देशों से पश्चिमी साहित्य तक
पुस्तक में संकलित 27 आलेख वैश्विक धरातल पर महात्मा गांधी के प्रभाव का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। इसमें मॉरीशस, इंग्लैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, जापान, अमेरिका, फिजी, सूरीनाम, नीदरलैंड, बुल्गारिया, कतर, नेपाल, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका तथा त्रिनिदाद एवं टोबैगो जैसे देशों में गांधी के प्रभाव और उनकी विरासत पर गंभीर शोधपत्र शामिल हैं।
"गांधी केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं; वे वैश्विक भारतवंशियों की अस्मिता, आत्मसम्मान और संघर्ष के शिल्पी हैं। यह पुस्तक दर्शाती है कि कैसे गांधी जी का प्रवास ही उनके व्यक्तित्व को गढ़ने की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना।"
— डॉ. मुन्नालाल गुप्ता (संपादक)
भौगोलिक सीमाओं के अतिरिक्त पुस्तक में कई मौलिक विषय-आधारित अध्याय भी जोड़े गए हैं, जिनमें मुख्य हैं:
- गांधी के जीवन में ‘बा’ की भूमिका: कस्तूरबा गांधी के मूक त्याग और सत्याग्रह में उनके योगदान का विश्लेषण।
- प्रवासी हिंदी साहित्य में गांधी: गिरमिटिया और आधुनिक डायस्पोरा द्वारा रचित साहित्य में गांधीवादी जीवन-मूल्य।
- जर्मन साहित्य में गांधी: यूरोपीय दार्शनिक चेतना और जर्मन भाषा के ग्रंथों में बापू के अहिंसा दर्शन की स्वीकृति।
- व्यक्तित्व में प्रवास की भूमिका: दक्षिण अफ्रीका के प्रवास ने कैसे एक बैरिस्टर को 'महात्मा' के रूप में रूपांतरित किया।
वैश्विक भारतवंशी विद्वानों का मिला सहयोग
लोकार्पण के अवसर पर संपादक द्वय डॉ. मुन्नालाल गुप्ता, डॉ. राजीव रंजन राय और सह-संपादिका डॉ. अर्चना बलवीर उपस्थित रहे। संपादकों ने विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और प्रवासी केंद्रों से जुड़े उन सभी विद्वानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की, जिनके गंभीर आलेखों से यह संकलन समृद्ध हुआ है।


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