'पत्रकारिता ना तो पक्ष है ना विपक्ष, यह असल में जनपक्ष है': वर्धा विश्वविद्यालय में बोले पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर; हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
वर्धा: हिंदी पत्रकारिता के ऐतिहासिक 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (MGAHV), वर्धा के जनसंचार विभाग द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष : विरासत, सरोकार और विकसित भारत का संकल्प’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने मुख्य वक्तव्य देते हुए रेखांकित किया कि पत्रकारिता का धर्म किसी खेमे में बंटना नहीं है; यह ना तो पक्ष है और ना ही विपक्ष, बल्कि इसका मूल अस्तित्व केवल और केवल ‘जनपक्ष’ है।
📌 राष्ट्रीय संगोष्ठी: मुख्य वैचारिक बिंदु
- पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर: युगल किशोर शुक्ल, भारतेंदु हरिश्चंद्र और बाबूराव विष्णु पराड़कर की समृद्ध विरासत को याद करते हुए भाषाई शुचिता और सरोकार पर दिया बल।
- प्रो. मनोज दयाल: पश्चिमी पत्रकारिता की परिभाषाओं को भारतीय संवेदना के परिप्रेक्ष्य में बदलने और हिंदी समाचार पत्रों के डिजिटल संग्रहालय का रखा प्रस्ताव।
- प्रो. बलदेवभाई शर्मा: स्वाधीनता के बाद पत्रकारिता के वास्तविक इतिहास शिक्षण में रही कमी; 'गलत का विरोध करना ही वास्तविक पत्रकारिता है, चाहे सरकार हो या समाज।'
- कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा: स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता सबसे धारदार शस्त्र थी; आज इस पर लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण का महती उत्तरदायित्व है।
- विशेष विमोचन: संगोष्ठी स्मारिका, जनसंचार विभाग द्वारा निर्मित वृत्तचित्र और 'मीडिया समय' पत्रिका का मंच से विमोचन।
📊 संगोष्ठी रूपरेखा एवं मंचासीन विभूतियां: एक दृष्टि में
| दायित्व / पद | विद्वान / वक्ता |
|---|---|
| उद्घाटन वक्ता | पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर (संस्थापक, माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय, भोपाल) |
| समारोह अध्यक्षा | प्रो. कुमुद शर्मा (कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) |
| सारस्वत अतिथि | प्रो. बलदेवभाई शर्मा (पूर्व अध्यक्ष, नेशनल बुक ट्रस्ट - NBT, भारत) |
| मुख्य अतिथि | प्रो. मनोज दयाल (कुलपति, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि, रायपुर) |
| मंचासीन प्रशासनिक प्रमुख | डॉ. सुरेन्द्र गादेवार (कुलसचिव, MGAHV वर्धा) |
मुद्रित माध्यमों का गौरव और भारतीय पत्रकारिता की ऐतिहासिक धारा
सप्रे संग्रहालय के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने प्रिंट मीडिया के 200 वर्षों के क्रमिक विकास का दस्तावेजी विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि समाचार की भाषा में गरिमा, अभिव्यक्ति में संतुलन और शैली में जनसरोकार होना ही पत्रकारिता की असली कसौटी है।
“पंडित युगल किशोर शुक्ल द्वारा ‘उदन्त मार्तण्ड’ के संपादन से लेकर भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र और बाबूराव विष्णु पराड़कर तक, हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्र जागरण और सामाजिक चेतना का जो दीप जलाया, वही हमारी सबसे अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर है। आज की पत्रकारिता को बाजारीकरण से बचकर जनपक्षधरता की उसी मूल धारा से प्रेरणा लेनी होगी।”
— पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर
भारतीय परिप्रेक्ष्य में समाचार की परिभाषा और डिजिटल संग्रहालय का प्रस्ताव
कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दयाल ने पत्रकारिता में हावी होते आर्थिक सिद्धांतों पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता से मानवीय संवेदनाएं और भावनाएं विस्थापित हो रही हैं।
- पश्चिमी मॉडल्स से मुक्ति: भारत की पत्रकारिता में समाचार की परिभाषा पश्चिम से आयातित रही है, जिसे अब भारतीय संस्कृति, लोक-संवेदना और मानवीय सरोकारों के अनुरूप पुनर्परिभाषित करना होगा।
- डिजिटल संग्रहालय का आह्वान: उन्होंने देश में हिंदी समाचार पत्रों, संपादकीय परंपराओं और ऐतिहासिक अंकों को संरक्षित करने हेतु एक व्यापक 'डिजिटल संग्रहालय' स्थापित करने का औपचारिक प्रस्ताव रखा।
नेशनल बुक ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बलदेवभाई शर्मा ने आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि स्वाधीनता के उपरांत नई पीढ़ी को पत्रकारिता का वास्तविक इतिहास गंभीरता से नहीं पढ़ाया गया। उन्होंने कहा—“बाहर की तू माटी फाँके, मन के अंदर क्यों न झाँके।” जब तक विद्यार्थी अपनी जड़ों और स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को नहीं समझेंगे, तब तक वे समाज या व्यवस्था में गलत का प्रतिकार करने वाले निर्भीक पत्रकार नहीं बन सकते।
'औपनिवेशिक दासता से मुक्ति की गाथा है हिंदी पत्रकारिता': प्रो. कुमुद शर्मा
अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों को काटने वाले सतत संघर्ष की गौरवगाथा है। आजादी की लड़ाई में अखबार केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनक्रांति का प्रमुख वैचारिक अस्त्र थे। स्वतंत्र भारत में भी लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानवीय मूल्यों को संवर्धित करना मीडिया का सर्वोच्च कर्तव्य है।
कार्यक्रम का प्रारंभ वैदिक दीप प्रज्वलन एवं विश्वविद्यालय कुलगीत से हुआ। अतिथियों का सम्मान सूतमाला, पारंपरिक शॉल एवं विश्वविद्यालय प्रतीक चिह्न भेंट कर किया गया। इस दौरान संगोष्ठी स्मारिका और विभाग की पत्रिका 'मीडिया समय' का विमोचन हुआ तथा जनसंचार विभाग द्वारा तैयार वृत्तचित्र प्रदर्शित किया गया।
स्वागत वक्तव्य अधिष्ठाता प्रो. के. बालराजु ने दिया, जबकि विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश लेहकपुरे ने विषय की प्रास्ताविकी रखी। मंच संचालन सहायक प्रोफेसर डॉ. रेणु सिंह एवं आभार ज्ञापन डॉ. संदीप कुमार वर्मा ने किया। इस बौद्धिक समागम में ‘वीणा’ पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा, प्रो. राममोहन पाठक (पूर्व कुलपति, डीबीएचपीएस चेन्नई), प्रो. संजय द्विवेदी (पूर्व महानिदेशक, आईआईएमसी) सहित देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शिक्षाविद, शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।



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