मासिक धर्म स्वच्छता दिवस: डॉ. आरएमएलआईएमएस लखनऊ में 'ईको-फ्रेंडली मेन्स्ट्रुअल सॉल्यूशन्स' कार्यशाला, 'प्रोजेक्ट HEAL' लॉन्च
लखनऊ। मासिक धर्म स्वच्छता दिवस 2026 के अवसर पर डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (Dr RMLIMS), लखनऊ में “ईको-फ्रेंडली मेन्स्ट्रुअल सॉल्यूशन्स” विषय पर एक विशेष कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम सौख्यम फाउंडेशन (माता अमृتانंदमयी मठ, केरल की पहल), संस्थान के सामुदायिक चिकित्सा एवं प्रसूति व स्त्री रोग विभाग और उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM) के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ।
प्रोजेक्ट HEAL का शुभारंभ और ऐतिहासिक MoU
इस विशेष अवसर पर संस्थान में “प्रोजेक्ट HEAL (Health Environment Active Living)” का आधिकारिक शुभारंभ किया गया। भविष्य में मासिक धर्म स्वच्छता, महिला स्वास्थ्य और टिकाऊ मेन्स्ट्रुअल सॉल्यूशन्स से जुड़ी गतिविधियों को व्यापक स्तर पर ले जाने के लिए सौख्यम फाउंडेशन और डॉ. आरएमएलआईएमएस लखनऊ के बीच एक महत्वपूर्ण एमओयू (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस परियोजना का संचालन मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. अरविंद सिंह के कुशल नेतृत्व में किया जाएगा।
ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाएगा 'बनाना फाइबर' सैनिटरी पैड
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि श्रीमती दीपा रंजन (IAS), प्रबंध निदेशक, UPSRLM ने ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव को लेकर एक महत्वपूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की शक्ति पर प्रकाश डाला।
स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बड़ी चुनौती है प्लास्टिक पैड
डॉ. आरएमएलआईएमएस के निदेशक डॉ. सी. एम. सिंह ने संस्थान में इस परियोजना की शुरुआत करते हुए चिकित्सा क्षेत्र में टिकाऊ प्रथाओं (sustainable healthcare practices) के महत्व को समझाया। उन्होंने सचेत किया कि बाजार में मिलने वाले प्लास्टिक आधारित डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड्स आज महिलाओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए एक गंभीर खतरा बन चुके हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सामुदायिक चिकित्सा विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. एस. डी. कांडपाल ने महिला स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता जागरूकता को जनस्वास्थ्य (Public Health) का सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक विषय बताया।
केले के रेशे (Banana Fibers) से बने पैड्स की खासियतें:
एक डिस्पोजेबल पैड = 4 पॉलीथीन बैग के बराबर कचरा
सौख्यम फाउंडेशन उत्तर प्रदेश की स्टेट डायरेक्टर डॉ. प्रियंका यादव ने “Ending Period Poverty” विषय पर बोलते हुए बेहद चौंकाने वाले आंकड़े साझा किए। उन्होंने बताया कि एक सामान्य डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड पर्यावरण को उतना ही नुकसान पहुंचाता है जितना कि चार पॉलीथीन बैग। इसके विपरीत ईको-फ्रेंडली पैड्स पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं।
इससे पहले, कार्यक्रम की शुरुआत में पीएमआर विभाग के डॉ. अमित रंजन ने सीएमई (CME) सत्र का परिचय दिया। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्य साझा करते हुए बताया कि हर साल 28 मई को ही मासिक धर्म स्वच्छता दिवस क्यों मनाया जाता है—क्योंकि महिलाओं का औसत मेन्स्ट्रुअल साइकिल 28 दिनों का होता है और पीरियड औसतन 5 दिनों तक रहता है।
गांवों में चलेगा व्यापक जागरूकता अभियान
इस कार्यशाला में लखनऊ के चिनहट और ग्रामीण इलाकों से आई लगभग 70 स्वयं सहायता समूह (SHG) कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य सखियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में यह निर्णय लिया गया कि डॉ. आरएमएलआईएमएस की सामुदायिक चिकित्सा एवं स्त्री रोग विभाग की टीम, UPSRLM और सौख्यम फाउंडेशन के साथ मिलकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तथा गांवों में घर-घर जाकर मेन्स्ट्रुअल हाइजीन अवेयरनेस अभियान चलाएगी।
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. नीतू सिंह ने महिलाओं के लिए सुरक्षित मासिक धर्म प्रथाओं पर व्याख्यान दिया। वहीं, सामुदायिक चिकित्सा विभाग की डॉ. रश्मि कुमारी ने समुदाय स्तर पर किशोरियों और महिलाओं में होने वाले क्रैम्प्स, रैशेज और पीरियड पेन से संबंधित जमीनी आंकड़े प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम का सफल संचालन सामुदायिक चिकित्सा विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. ऋतिका चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर संस्थान के फैकल्टी सदस्य, नर्सिंग छात्र-छात्राएं, पैरामेडिकल स्टाफ, चीफ नर्सिंग ऑफिसर (CNO) सुमन सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों की महिला प्रतिभागी उपस्थित रहीं। कार्यशाला के अंत में सभी ने आने वाली पीढ़ियों के बेहतर कल के लिए स्वस्थ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल टिकाऊ मेन्स्ट्रुअल प्रैक्टिसेज अपनाने का संकल्प लिया।

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