डॉ. कुसुम शुक्ला बनी हस्तशिल्प एवं लोक कलाएं की प्रभारी
लखनऊ। प्रधानमंत्री द्वारा लोकल के लिए वोकल बनने के आह्वान को दृष्टिगत रखते हुए हस्तशिल्प और लोक कलाओं को प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके लिए हस्तशिल्प के नमूने एकत्र करने, उनकी विपणन व्यवस्था करने, लोक कलाओं को लेकर शोध करने और लुप्तप्राय कलाओं को संरक्षित करने के प्रयास किए जाएंगे। लोक संस्कृति शोध संस्थान द्वारा इसके लिए लोकानुरागी डॉ. कुसुम शुक्ला को हस्तशिल्प एवं लोक कलाएं का प्रभारी बनाया गया है।
उक्त जानकारी देते हुए संस्थान की सचिव सुधा द्विवेदी ने बताया कि अब लोग शनैः शनैः प्रत्येक कार्य के लिए बाजार पर ही आश्रित होते जा रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर गत दिनों प्रधानमंत्री ने ‘लोकल के लिए वोकल’ बनने की बात कही थी। इसी को ध्यान में रखते हुए पेशे से अध्यापिका एवं लोक कला अनुरागी डॉ. कुसुम शुक्ला को पारम्परिक लोक कला और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए संस्थान की ओर से प्रभारी मनोनीत किया गया है।
उन्होंने कहाकि हस्तशिल्प भी अब परिवारों से लुप्त हो रहा है। स्वेटर बुनना, क्रुश द्वारा रुमाल, चादर, तकिये के खोल बनाना, डलिया बनाना समेत अनेक कार्य घरों में महिलायें बहुत आसानी से कर लेती थीं। तीज-त्योहारों में घर की दीवारों पर चित्र बनाना, अल्पना, चौक पुरना आदि भी होता था। लोक कलायें, हस्तशिल्प, पारम्परिक व्यंजन बनाने की विधि आदि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तान्तरित होती रही। बाजारीकरण के परिदृश्य में लोक कलाओं को लुप्त होने से बचाने, इनके बारे में नयी पीढ़ी को बताने तथा हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इस दिशा में संस्थान द्वारा हस्तशिल्पियों को स्वावलम्बी बनाने और निर्मित उत्पादों के विपणन हेतु नेटवर्क की स्थापना होगी। डॉ. शुक्ला के मनोनयन पर मंजू श्री, आभा शुक्ला, जीतेश श्रीवास्तव, एस.के. गोपाल, प्रदीप शुक्ल, सुधा पाण्डेय, रेनू द्विवेदी, कला नैथानी, रामकृष्ण थपलियाल आदि ने प्रसन्नता जताई है।


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