वर्धा में दिखा बंगाल की दुर्गा पूजा का 'मिनी दृश्य': रेलवे इंस्टीट्यूट में सार्बजनीन दुर्गोत्सव का शुभारंभ, 'चतुरंग' स्मारिका का हुआ विमोचन
वर्धा: बंगाल का जगविख्यात दुर्गा पूजा उत्सव अपनी भव्यता, सांस्कृतिक गहराई और सामूहिक उल्लास के लिए पूरे विश्व में पहचाना जाता है। षष्ठी से लेकर विजयादशमी तक चलने वाले इस पांच दिवसीय महापर्व का वही पारंपरिक और जीवंत 'मिनी दृश्य' इन दिनों महाराष्ट्र के वर्धा शहर स्थित रेलवे इंस्टीट्यूट में साकार हो उठा है। वर्धा में निवासरत बंगाली परिवारों द्वारा आयोजित सार्बजनीन दुर्गा पूजा उत्सव का षष्ठी तिथि पर वैदिक मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान से शुभारंभ किया गया। इस पावन अवसर पर पूजा समिति की वार्षिक स्मारिका ‘चतुरंग’ का औपचारिक विमोचन भी संपन्न हुआ।
📌 वर्धा सार्बजनीन दुर्गोत्सव: मुख्य बिंदु
- पाँच दिवसीय महापूजन: षष्ठी से विजयादशमी तक शास्त्रीय बंगाली रीति-रिवाजों से मां दुर्गा की महापूजा।
- स्मारिका 'चतुरंग' का विमोचन: उत्सव के सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व को संजोए पूजा स्मारिका जारी।
- सामाजिक सरोकार व सेवा: शारदा मूक-बधिर विद्यालय के बच्चों के साथ महाप्रसाद का सहभोज एवं निःशुल्क स्कूल बैग का वितरण।
- पारंपरिक धुनुचि नाच: ढाक की थाप और धूपदान (धुनुचि) के साथ श्रद्धालुओं द्वारा भावपूर्ण एवं कलात्मक नृत्य।
- दशमी का सिंदूर खेला: विवाहित महिलाओं द्वारा मां के चरणों का सिंदूर लगाने और परस्पर सिंदूर उत्सव मनाने की तैयारी।
📊 सार्बजनीन दुर्गा पूजा वर्धा: आयोजन एवं सांस्कृतिक रूपरेखा
| पहलू / कार्यक्रम | आयोजन विवरण एवं सांस्कृतिक मान्यता |
|---|---|
| आयोजन स्थल | रेलवे इंस्टीट्यूट प्रांगण, वर्धा (महाराष्ट्र) |
| उत्सव की अवधि | महाषष्ठी से विजयादशमी तक (पंचदिवसीय अनुष्ठान) |
| प्रकाशित स्मारिका | ‘चतुरंग’ (सांस्कृतिक व वैचारिक संकलन) |
| सामाजिक सेवा प्रकल्प | मूक-बधिर बच्चों के साथ महाप्रसाद सहभोज एवं निःशुल्क स्कूल बैग वितरण |
| प्रमुख पारंपरिक आकर्षण | शाम की आरती में धुनुचि नाच एवं दशमी को सिंदूर खेला |
आस्था के साथ सेवा: मूक-बधिर बच्चों के साथ मनेगा महाप्रसाद उत्सव
वर्धा में आयोजित होने वाली इस दुर्गा पूजा की पहचान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और सेवा का भी प्रेरक केंद्र है। पूजा के दौरान विशेष रूप से शारदा मूक-बधिर विद्यालय के बच्चों को आमंत्रित किया गया है।
- महाप्रसाद सहभोज: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ बैठकर समिति के सदस्य और श्रद्धालु महाप्रसाद ग्रहण करेंगे।
- शैक्षणिक सहयोग: अध्ययनरत मूक-बधिर विद्यार्थियों को प्रोत्साहन स्वरूप निःशुल्क स्कूल बैग और आवश्यक अध्ययन सामग्री वितरित की जाएगी।
- सांस्कृतिक संध्याएं: स्थानीय प्रतिभाओं और बच्चों द्वारा प्रतिदिन पारंपरिक बंगाली संगीत, नाटक और नृत्य की प्रस्तुतियां दी जा रही हैं।
धुनुचि नाच और सिंदूर खेला: बंगाली पूजन की दो अनूठी विशेषताएं
बंगाली दुर्गा पूजा में दो परंपराएं श्रद्धालुओं के आकर्षण और आस्था का मुख्य केंद्र होती हैं:
“धुनुचि नाच: शाम की महाआरती के दौरान ढाक के पारंपरिक ताल पर स्त्री और पुरुष हाथों या मुंह में धधकते धूमन युक्त मिट्टी के पात्र (धुनुचि) को संभालते हुए लयबद्ध नृत्य करते हैं। यह शक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक है।
सिंदूर खेला: विजयादशमी के दिन विसर्जन से पूर्व सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा के चरणों में सिंदूर अर्पित करती हैं और उसी सिंदूर को वर्षभर माथे पर धारण करती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य और खुशहाली की कामना के साथ सिंदूर खेला का उल्लास मनाया जाता है।”
महीनों की तैयारी और समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम
इस भव्य आयोजन को मूर्त रूप देने के लिए पूजा समिति की विभिन्न उप-समितियां पिछले कई महीनों से सक्रिय थीं। आयोजन को सफल बनाने में समिति के संरक्षक अंकित कुमार मिश्र के साथ-साथ वरिष्ठ सदस्यों का सराहनीय योगदान रहा।
सहयोग प्रदान करने वालों में प्रमुख रूप से: असीम चक्रवर्ती, डॉ. आलोक विश्वास, एच.एन. घोष, अर्नब नाग, अनु मुखर्जी, डॉ. अनिर्बाण घोष, डॉ. अमित विश्वास, शुभाशीष चटर्जी, प्रकाश मजूमदार, प्रदीप मजूमदार, डॉ. सैकत विश्वास, दिलीप चक्रवर्ती, विमल डे, बी.एन. दास, प्रोबीर नंदी, आर.के. बर्मन, अभिषेक कुण्डू, धनंजय भट्टाचार्य और सत्यम अधिकारी सहित बड़ी संख्या में समाज के गणमान्य लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।


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